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क्या हेल्थ प्रीमियम पर कम होगा GST? जानें इंश्योरेंस सेक्टर की बड़ी मांग

रिपोर्ट टाइम्स।

यूनियन बजट 2025 से इंडियन हेल्थ सेक्टर भी आस लगाए बैठा है. यह सेक्टर उम्मीद करता है कि आगामी बजट में सरकार ऐसे फैसले लेगी, जिनसे ज्यादा से ज्यादा लोग बीमा पॉलिसी लेने के लिए उत्साहित होंगे. हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर GST घटाकर और सेक्शन 80D के तहत टैक्स में छूट देकर ऐसा किया जा सकता है. 2024 में भारतीय इंश्योरेंस कंपनियों का प्रदर्शन मिला-जुला रहा. कुछ कंपनियों ने अच्छा मुनाफा कमाया, जबकि कुछ को नुकसान हुआ.

2024 में इंश्योरेंस कंपनियों की परफॉर्मेंस देखें तो जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया ने 44 फीसदी का शानदार रिटर्न दिया, जबकि ICICI लोम्बार्ड और ICICI प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस ने भी अच्छा परफॉर्म किया.

दूसरी तरफ, लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन का रिटर्न सिर्फ 7 फीसदी था. कुछ कंपनियां जैसे SBI लाइफ, HDFC लाइफ और स्टार हेल्थ को नुकसान हुआ. इससे यह साफ होता है कि बीमा सेक्टर में हालात बहुत अलग-अलग हैं.

इंश्योरेंस सेक्टर को उम्मीद है कि आगामी बजट 2025 में कुछ जरूरी सुधार किए जाएंगे, जो बीमा लेने वालों और कंपनियों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं. आइए जानते हैं कि बीमा सेक्टर की क्या बड़ी मांगें हैं:

हेल्थ इंश्योरेंस पर GST कम करने की मांग

इंश्योरेंस एक्सपर्ट्स चाहते हैं कि हेल्थ इंश्योरेंस और टर्म इंश्योरेंस पर लगने वाली जीएसटी दर को घटाया जाए. फिलहाल, हेल्थ इंश्योरेंस पर 18 फीसदी जीएसटी लगता है, जो लोगों के लिए बीमा लेना महंगा बना देता है. अगर जीएसटी कम किया जाए, तो इससे हेल्थ बीमा ज्यादा लोगों तक पहुंच सकेगा और ज्यादा लोग इसका फायदा उठा पाएंगे. इससे लोगों को हेल्थ इंश्योरेंस लेने के लिए बढ़ावा मिलेगा.

सेक्शन 80D में सुधार की मांग

सेक्शन 80D के तहत हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर टैक्स छूट मिलती है, लेकिन यह छूट काफी सीमित है. इंडस्ट्री की डिमांड है कि इसे 25,000 रुपये से बढ़ाकर 50,000 रुपये किया जाए, ताकि लोग ज्यादा हेल्थ इंश्योरेंस ले सकें. खासकर सीनियर सिटिजंस के लिए यह छूट 1,00,000 रुपये तक बढ़ाई जानी चाहिए. इसके अलावा यह छूट न्यू टैक्स रिजीम में भी लागू होनी चाहिए.

अलग हॉस्पिटल रेगुलेटर बनाने की जरूरत

बीमा कंपनियों के सामने एक और बड़ी चुनौती है इलाज का बढ़ता खर्च. इसका मतलब है कि अस्पतालों के खर्च में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. बीमा कंपनियां केवल तीन साल में एक बार अपने प्रोडक्ट्स के प्राइस बदल सकती हैं.

इसलिए एक्सपर्ट्स का कहना है कि हॉस्पिटल लेवल पर कीमत तय करने के लिए अलग रेगुलेटर बॉडी बनाई जाए. इससे अस्पतालों जो सर्विस देते हैं, और पैसा लेते हैं उसमें ट्रांसपेरेंसी आएगी और बीमा कंपनियों के लिए प्रोडक्ट की कीमतें तय करना आसान होगा.

लाइफ इंश्योरेंस पर अलग से मिले टैक्स रिबेट

बीमा कंपनियों का कहना है कि लाइफ इंश्योरेंस प्रीमियम के लिए एक अलग से टैक्स छूट दी जाए. अब तक यह छूट सेक्शन 80C के तहत दी जाती है, लेकिन अगर इसे अलग किया जाएगा, तो लोग ज्यादा जीवन बीमा खरीदेंगे. इससे बीमाधारकों को फायदा होगा और इंश्योरेंस सेक्टर को भी बढ़ावा मिलेगा.

इनकम टैक्स स्लैब और छूट में बदलाव

बीमा सेक्टर की एक मांग यह भी है कि इनकम टैक्स स्लैब और छूट सीमाओं को फिर से देखा जाए, ताकि लोगों के पास ज्यादा डिस्पोजेबल इनकम हो. इससे ज्यादा लोग बीमा में निवेश कर सकेंगे, और इंश्योरेंस की मार्केट बढ़ेगी. न केवल इंश्योरेंस सेक्टर में ग्रोथ देखने को मिलेगी, बल्कि लोगों को भी सुरक्षा मिलेगी.

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