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रणनीति या आजादी… NATO का हिस्सा क्यों नहीं बनना चाहता भारत, जो कई देशों का सपना?

अमेरिका में मंगलवार से नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (NATO) शिखर सम्मेलन की शुरुआत हो गई है. चर्चा है कि इस समिट में अमेरिका यूक्रेन के लिए अपना मजबूत समर्थन पेश करेगा. यूरोपीय देशों के लिए अमेरिका कई घोषणएं कर सकता है. 9 से 11 जुलाई तक चलने वाली समिट इसलिए भी खास है क्योंकि इस साल नाटो अपनी 75वीं वर्षगांठ मना रहा है. वर्तमान में दुनिया के 32 देश नाटो के सदस्य हैं. इस साल मार्च में स्वीडन नाटो का सदस्य बना था. अब समिट में नए सदस्य का स्वागत किया जाएगा. पिछले कुछ सालों में नाटो से कई देश जुड़े हैं, लेकिन भारत ने दूरी बनाई हुई है. जानिए, भारत अब तक क्यों नहीं बना नाटो का सदस्य.

क्या है नाटो, करता क्या है?

नाटो का गठन साल 1949 में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और फ्रांस सहित 12 देशों ने मिलकर किया था. इसकी स्थापना संधि पर वाशिंगटन डीसी के मेलन ऑडिटोरियम में हस्ताक्षर किए गए थे. नाटो का लक्ष्य सोवियत संघ को यूरोप में विस्तार को रोकना था. इसके सदस्य इस बात पर सहमत हैं कि यदि उनमें से किसी पर हमला होता है, तो अन्य सदस्यों को बचाव में मदद करनी चाहिए. नाटो के पास अपनी कोई सेना नहीं है, लेकिन सदस्य देश संकट की स्थिति में सामूहिक सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं. यानी मिलकर एक-दूसरे की मदद करते हैं. आसान भाषा में समझें तो सदस्य देशों को स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी देना इसका लक्ष्य है. यूरोप और उत्तरी अमेरिका में नाटो के 32 सदस्य हैं, जिनमें ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन और तुर्की शामिल हैं. अंतिम देश जो नाटो का हिस्सा बने वो फिनलैंड और स्वीडन हैं. फिलहाल, यूक्रेन, बोस्निया और हर्जेगोविना तथा जॉर्जिया अभी नाटो में शामिल होने के इंतजार में हैं. हालांकि, नाटो देशों ने यूक्रेन को हथियार दिए ताकि वो रूस को जवाब दे सके.

भारत क्यों नहीं बना NATO का हिस्सा?

दुनिया के कई देश नाटो का हिस्सा बनने की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन भारत ने कभी ऐसा करने की कोशिश नहीं की. इसकी कई वजह रही हैं. एक वजह है गुट निरपेक्ष आंदोलन. इसे समझने के लिए इतिहास में जाना होगा. द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हो चुका था. अमेरिका और सोवियत संघ दो गुट बन चुके थे. पूर्व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का मानना था कि एशिया और अफ्रीका के नए आजाद और गरीब देशों को बड़ी शक्तियों के सैनिक गुट से फायदे की जगह नुकसान होगा. इसलिए बेहतर होगा कि एक नया गुट बने. इस तरह गुट निरपेक्ष आंदोलन शुरू हुआ. इसका श्रेय भारत को दिया जाता है. इस पहल का लक्ष्य था कि इससे जुड़े देश न तो किसी पावर ब्लॉक का हिस्सा होंगे और न ही किसी का विरोध करेंगे. गुटनिरपेक्ष आंदोलन कई राष्ट्रों की एक अंतराराष्ट्रीय संस्था है. वर्तमान हालात को देखें तो भारत का रुख रूस और यूक्रेन के लिए स्पष्ट रहा है.

स्वतंत्र निर्णय की लेने पर असर

नाटो का सदस्य न बनने के पीछे दूसरी वजह है, निर्णय लेने के लिए स्वतंत्रता. भारत ने हमेशा से रणनीतिक स्वायत्तता को महत्व दिया है. भारत ने हमेशा से ही अपनी विदेश और रक्षा नीतियों के संबंध में स्वतंत्र निर्णय लिए हैं. नाटो के सैन्य गठबंधन में शामिल होने पर भारत को नाटो मेम्बर देशों की रक्षा नीतियों और रणनीतियों जुड़ना होगा. ऐसा होने पर उसके स्वतंत्र रूप निर्णय लेने की क्षमता पर असर पड़ेगा. नाटो का सदस्य बनने पर भारत को कई सैन्य अभियानों और करार का हिस्सा बनना पड़ेगा. ऐसा न होने पर भारत इस बात के लिए स्वतंत्र रहेगा कि किस देश के साथ सैन्य अभियान चलाएगा और किसके साथ नहीं. देश मिलिट्री पार्टनरशिप को लेकर स्वतंत्र निर्णय ले सकेगा.

भारत को नाटो प्लस में शामिल करना चाहता था अमेरिका

सालभर पहले भारत को नाटो प्लस का हिस्सा बनाने के लिए अमेरिकी संसद की सेलेक्ट कमेटी ने सिफारिश की थी, लेकिन भारत ने अपना रुख साफ कर दिया था. विदेश मंत्री जयशंकर ने साफ किया था कि वो नाटो प्लस का दर्जा पाने के लिए उत्सुक नहीं है. भारत ने इसलिए भी अपना रुख साफ किया था क्योंकि देश किसी भी चुनौती से निपटने में सक्षम है. अगर भारत मेंबर बनता है तो अमेरिकी खेमे का ठप्पा लग सकता है.

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