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‘अहम और अहंकार’ व्यक्ति और संस्था दोनों के लिए घातक… धनखड़ ने बताया प्रजातंत्र की असली परिभाषा

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा है कि मुझे मुफ्त में कोई भी चीज लेने की आदत नहीं है. मुझे चुनौतियां पसंद हैं. संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करना प्राथमिक जिम्मेदारी है. उन्होंने कहा कि यदि कोई अपराध आम जनमानस को झकझोरता है, तो उस पर पर्दा नहीं डाला जा सकता. अपराध का समाधान कानून के अनुसार ही होना चाहिए.

उपराष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे गरिमापूर्ण और संवैधानिक पदों पर टिप्पणियां चिंतन और मनन का विषय है. उन्होंने कहा कि संविधान टकराव की नहीं, बल्कि संवाद, विचार-विमर्श और स्वस्थ बहस की अपेक्षा करता है. प्रजातंत्र की असली परिभाषा है अभिव्यक्ति और वाद-विवाद है. धनखड़ ने कहा कि मुझे न्यायपालिका के प्रति अत्यंत सम्मान है.

उन्होंने कहा कि सभी संस्थाओं को आपसी तालमेल से काम करना चाहिए. उपराष्ट्रपति ने कहा कि सबसे खतरनाक चुनौती वह है जो अपनों से मिलती है, जिसकी हम चर्चा नहीं कर सकते. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने ये बातें उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की आत्मकथा ‘चुनौतियां मुझे पसंद हैं’ के विमोचन के दौरान कहीं.

धनखड़ ने कहा कि मुझे चुनौतियां पसंद हैं और संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करना हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी है. इसमें कोई कोताही स्वीकार नहीं की जा सकती. उन्होंने कहा कि चुनौतियों का मैं भी शिकार हूं, पर हमारे सामने एक बहुत बड़ी ताकत है और हमारी ताकत है हमारा दर्शन, जिन्होंने हमें कह रखा है, जब भी कोई संकट आए, वेद की तरफ ध्यान दो, गीता, रामायण, महाभारत की तरफ ध्यान दो. मगर कभी भी कर्तव्य पथ से अलग नहीं हटना है.

‘संविधान में दो पद सर्वोच्च माने गए हैं’

संवैधानिक पदों पर हुई टिप्पणियों के प्रति गहरी चिंता ज़ाहिर करते हुए धनखड़ ने कहा कि हमारे संविधान में दो पद सर्वोच्च माने गए हैं. एक है भारत के राष्ट्रपति का और दूसरा राज्यपाल का. वे इसलिए सर्वोच्च हैं क्योंकि जो शपथ आपने ली है, जो शपथ मैंने ली है, जो शपथ सांसद, मंत्री, विधायक या किसी भी न्यायाधीश ने ली है-वह शपथ होती है: मैं संविधान का पालन करूंगा. मगर द्रौपदी मुर्मू (राष्ट्रपति) और आनंदीबेन पटेल (राज्यपाल) की शपथ इससे अलग है. उनकी शपथ होती है: “मैं संविधान की रक्षा करूंगा, उसका संरक्षण और बचाव करूंगा. और दूसरी शपथ होती है: “मैं जनता की सेवा करूंगा”-राष्ट्रपति के लिए भारत की जनता की और राज्यपाल के लिए संबंधित राज्य की जनता की. ऐसे गरिमापूर्ण और संवैधानिक पदों पर यदि टिप्पणियाँ की जाती हैं, तो वह मेरे अनुसार चिंतन और मनन का विषय है.

धनखड़ ने बताया प्रजातंत्र की असली परिभाषा

वहीं, प्रजातंत्र में अभिव्यक्ति और वाद-विवाद के महत्व पर ज़ोर देते हुए धनखड़ ने कहा कि एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही गई है, जो हम सभी के लिए अत्यंत आवश्यक है. हम अपने आपको प्रजातंत्र क्यों कहते हैं? आर्थिक उन्नति, संस्थागत ढांचे का विकास, तकनीक का विस्तार ये सब महत्वपूर्ण हैं लेकिन प्रजातंत्र की असली परिभाषा है-अभिव्यक्ति और वाद-विवाद. अभिव्यक्ति और संवाद ही लोकतंत्र का आधार हैं. धनखड़ ने कहा कि यदि अभिव्यक्ति पर अंकुश लगने लगे, तो किसी भी राष्ट्र के लिए अपने आप को लोकतांत्रिक कहना कठिन हो जाएगा. लेकिन अभिव्यक्ति का कोई अर्थ नहीं रह जाता यदि उसके साथ वाद-विवाद न हो. यदि अभिव्यक्ति इस हद तक पहुंच जाए कि बोलने वाला यह समझे कि “मैं ही सही हूं” और बाकी सभी परिस्थितियों में गलत हैं, उनकी बात सुनने का कोई प्रयास ही न हो तो यह अभिव्यक्ति का अधिकार नहीं, बल्कि उसका विकार बन जाता है.

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी परिभाषित होता है जब एक समग्र पारिस्थितिकी तंत्र में अभिव्यक्ति और संवाद एक साथ फलते-फूलते हैं. ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और यदि अभिव्यक्ति चरम पर पहुंच जाए लेकिन संवाद न हो, तो हमारे वेदों का जो दर्शन है- अनंतवाद, वह समाप्त हो जाएगा और उसके स्थान पर जन्म होगा ‘अहम और अहंकार’ का. यह ‘अहम और अहंकार’ व्यक्ति और संस्था दोनों के लिए घातक हैं.

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