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444 करोड़ साल पहले जन्म, कीमती धातुओं की मौजूदगी… आज भी पहेली बना हुआ है चांद

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भारत का चंद्रयान मिशन हो या रूस का लूना मिशन या फिर अमेरिका का आर्टेमिस मिशन, हर अभियान का लक्ष्य चांद के बारे में नई जानकारी जुटाना है. इनमें से एक सवाल चांद के अस्तित्व से जुड़ा है. चांद का जन्म कैसे हुआ, ये एक बड़ी वैज्ञानिक पहेली है. इस प्रश्न का कोई निर्णायक उत्तर अभी तक नहीं मिला है. वैज्ञानिक लगातार इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए रिसर्च कर रहे हैं. चांद को लेकर सबसे पुख्ता थ्योरी अमेरिका के अपोलो मिशन की रिसर्च के बाद सामने आई. अपोलो मिशन अपने साथ चांद की सतह से चट्टानों के टुकड़े लेकर आया. इन टुकड़ों पर शोध के आधार पर वैज्ञानिकों ने दावा किया कि चंद्रमा 444 करोड़ साल पहले अस्तित्व में आया. 444 करोड़ साल पहले मंगल ग्रह के आकार का प्रोटोप्लानेट पृथ्वी से टकराया. इस घटना को वैज्ञानिक Giant Impact कहते हैं.

कीमती धातुओं की है मौजूदगी

इस टक्कर से पृथ्वी का एक बड़ा हिस्सा टूट गया. भीषण टक्कर से बहुत ज्यादा गर्मी पैदा हुई, जिससे चट्टानें पिघल गई. इस टक्कर में गर्म गैस और भारी मलबा निकला. 20 करोड़ साल तक चांद की विशाल दरारों में गर्म गैस और लावा बहता रहा. करोड़ों साल बाद ये चट्टानें ठंडी होकर पृथ्वी की परिक्रमा करने लगी.चट्टानों के इसी गोले को चंद्रमा कहा जाता है. कनाडा की डलहौजी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेम्स ब्रेनन के मुताबिक चांद पर मौजूद ज्वालामुखी पत्थरों में पाए जाने वाले सल्फर का संबंध चांद के अंदर छिपे आयरन सल्फेट से है. इसी आधार पर दावा किया जाता है कि चांद में प्लेटिनम और पलाडियम जैसी मूल्यवान धातुओं की मौजूदगी है.चन्द्रमा पर वायुमण्डल नहीं है. दरअसल चन्द्रमा पर पलायन वेग करीब 2.4 किमी./सेकण्ड होता है. इसलिए जिन गैसों के अणुओं की माध्य चाल 2.4 किमी./सेकंड अथवा इससे अधिक होती है, वे चन्द्रमा की सतह को हमेशा के लिए छोड़कर स्पेस में चले जाते हैं. लेकिन नासा के अपोलो 17 मिशन की रिसर्च के मुताबिक चांद पर बहुत कम मात्रा में हीलियम, नियोन, अमोनिया, मीथेन और कार्बन डाई-ऑक्साइड गैस पाई गईं.

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