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लपटों के बीच नृत्य जलती लकड़ी पर इंसान ने किया ऐसा काम, जिसे देख लोग रह गए दंग

भीलवाड़ा। रिपोर्ट टाइम्स।

भारत की संस्कृति और परंपराओं में कई ऐसी अद्भुत मान्यताएं अनुष्ठान हैं, जो आस्था और साहस की पराकाष्ठा को दर्शाते हैं। राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में एक ऐसी ही प्राचीन और रहस्यमयी परंपरा है. ‘अग्नि नृत्य’। सदियों पुरानी इस परंपरा के पीछे एक ऐसा ऐतिहासिक दावा जुड़ा है, जो इसे और भी रोमांचक बनाता है। कहा जाता है कि यह परंपरा औरंगजेब के शासनकाल से चली आ रही है, जब सनातन धर्म की शक्ति को सिद्ध करने के लिए यह अग्नि परीक्षा दी गई थी।

भीलवाड़ा जिले के खटवाड़ा गांव में जब पूरा माहौल भक्ति और ऊर्जा से गूंज रहा था, तभी गांव के चौक पर 5 क्विंटल सूखी लकड़ियों से अग्नि सेज तैयार की गई। जैसे ही लपटें आसमान छूने लगीं और अंगारे दहकने लगे, नाथ संप्रदाय के अनुयायी आस्था और साहस की इस अग्नि परीक्षा में कूद पड़े। उन्होंने जलते अंगारों पर नृत्य किया, मानो अग्नि भी उनके संकल्प के आगे झुक गई हो।

यह आयोजन महारुद्र यज्ञ और मंदिर मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा के पावन अवसर पर किया गया था। धधकते अंगारों के बीच नाचते इन साधकों को देख हर कोई हैरान रह गया। यह सिर्फ एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सनातन धर्म की शक्ति और विश्वास का जीवंत प्रमाण है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।

धर्म के प्रति भक्ति को प्रकट करता है अग्नि नृत्य

नाथ संप्रदाय के अनुयायी और बीकानेर निवासी प्रह्लाद नाथ सिद्ध बताते हैं कि रविवार शाम 5 क्विंटल सूखी लकड़ी से अग्नि सेज तैयार की गई थी। अंगारों पर नाथ संप्रदाय के साधुओं का नृत्य उनकी भक्ति और आत्मविश्वास को प्रकट करता है। इस अनूठे दृश्य को देखने के लिए आसपास के कई गांवों से हजारों लोग पहुंचे। देर रात तक चले इस कार्यक्रम में अंगारों पर चलने, बैठने और विभिन्न मुद्राओं में नृत्य करने का प्रदर्शन किया गया।

सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत रखते हैं नाथ संप्रदाय के अनुयायी

बीकानेर के नाथ समाज के लोग सदियों से इस अग्नि नृत्य का आयोजन करते आ रहे हैं। सबसे पहले सनातन धर्म की शक्ति को साबित करने के लिए औरंगजेब के दरबार में जसनाथ महाराज के शिष्य रुस्तम महाराज ने यह नृत्य किया था। यह परंपरा तब से चली आ रही है और आज भी जसनाथी संप्रदाय के अनुयायी इसे पूरी आस्था के साथ निभाते हैं।

औरंगजेब को दिखाया था सनातन धर्म की ताकत

प्रह्लाद नाथ बताते हैं कि जसनाथ महाराज का जन्म 1539 संवत में बीकानेर जिले के कतरियासर गांव में हुआ था। 12 वर्ष की आयु में ही वे भक्ति मार्ग पर अग्रसर हो गए थे। उस समय देश में मुगल सम्राट औरंगजेब का शासन था।

एक बार औरंगजेब ने जसनाथ महाराज को चुनौती दी और कहा, “अगर तुम्हारे सनातन धर्म में शक्ति है तो दिल्ली आकर इसे सिद्ध करो।” महाराज के शिष्य रुस्तम महाराज दिल्ली पहुंचे, जहां औरंगजेब ने उन्हें अंगारों पर नृत्य करने की चुनौती दी।

‘अग्नि डांस’ के पीछे धर्म बचाने की मान्यता

औरंगजेब ने एक बड़ा गड्ढा खुदवाया, उसमें जलते हुए अंगारे भरवाए और आदेश दिया कि अगर सनातन धर्म की शक्ति वास्तविक है, तो उसमें नृत्य करके दिखाया जाए।

रुस्तम महाराज ने इस चुनौती को स्वीकार किया और जैसे ही उन्होंने अग्नि में कदम रखा, उन्हें अपने गुरु जसनाथ महाराज के दिव्य दर्शन हुए। महाराज ने रुस्तम को आशीर्वाद दिया और कहा, “बेटा, घबराने की जरूरत नहीं, बस विश्वास के साथ आगे बढ़ो।”

इसके बाद रुस्तम महाराज ने ‘फतेह-फतेह’ का उद्घोष करते हुए अंगारों पर नृत्य किया। इतना ही नहीं, जलती आग से एक तरबूज (मतीरा) लेकर बाहर आए, लेकिन उनके शरीर पर आग का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। यह देखकर औरंगजेब भी चकित रह गया और उसने स्वीकार किया कि सनातन धर्म में शक्ति है।

सनातन धर्म की रक्षा के लिए मिला ताम्रपत्र

रुस्तम महाराज ने औरंगजेब से कहा कि अगर वह वास्तव में सनातन धर्म की शक्ति को स्वीकार करता है, तो उसे इसका सम्मान करना चाहिए। उन्होंने ताम्रपत्र की मांग की, जिसमें गाय, मंदिरों और बहन-बेटियों की रक्षा का वचन हो।

औरंगजेब ने उनकी यह मांग स्वीकार कर ली और एक ताम्रपत्र लिखकर सनातन धर्म की महिमा को स्वीकार किया।

आज भी यह ‘अग्नि नृत्य’ जसनाथ संप्रदाय की आस्था और वीरता का प्रतीक बना हुआ है। इसे देखने के लिए हर साल हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं और इस अद्भुत परंपरा को नमन करते हैं।

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