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इमरजेंसी पीड़ितों के लिए पेंशन का ऐलान, विपक्ष ने बताया ‘जनता को ठगने की साजिश’

जयपुर। रिपोर्ट टाइम्स।

लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए ऐतिहासिक फैसलों में एक और अध्याय जुड़ गया है। राजस्थान विधानसभा में ‘लोकतंत्र सेनानियों का सम्मान बिल’ पारित कर दिया गया, जिससे आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले लोगों की पेंशन को कानूनी सुरक्षा मिल गई है।

राजस्थान सरकार ने इस कानून के जरिए यह सुनिश्चित कर दिया है कि आने वाली कोई भी सरकार सिर्फ प्रशासनिक आदेश से इस पेंशन और सुविधाओं को रोक नहीं सकेगी। आपातकाल के दौरान 30 दिन तक जेल में रहे लोगों को इस योजना के तहत लाभ मिलेगा, और उनकी मृत्यु के बाद उनके जीवनसाथी को भी यह पेंशन मिलती रहेगी। वर्तमान में राजस्थान में 1100 लोकतंत्र सेनानियों को यह पेंशन मिल रही है।

राजस्थान सरकार ने लोकतंत्र सेनानियों की पेंशन और सुविधाओं के लिए 40 करोड़ रुपए का बजट निर्धारित किया है, जिसका उल्लेख नए बिल में किया गया है। जल्द ही इस बिल के तहत नियम बनाए जाएंगे, जिनमें कुछ और प्रावधानों को शामिल किया जाएगा।

कौन हैं लोकतंत्र सेनानी?

आपातकाल के दौरान 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक राजनीतिक और सामाजिक कारणों से जेल जाने वालों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा दिया गया है। यदि किसी लोकतंत्र सेनानी की मृत्यु हो जाती है, तो उनके पति या पत्नी को पेंशन का लाभ मिलेगा, लेकिन इसके लिए मृत्यु के 90 दिन के भीतर आवेदन करना आवश्यक होगा।

राजस्थान में सरकार बदलने के बाद मीसा बंदियों को पेंशन मिलने लगी थी। भजनलाल सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में मीसा और डीआईआर बंदियों को 20,000 रुपये मासिक पेंशन, 4,000 रुपये मेडिकल भत्ता और राजस्थान रोडवेज में मुफ्त यात्रा सुविधा देने का फैसला लिया था।

अब कोई सरकार आसानी से नहीं रोक सकेगी पेंशन

इस बिल के पारित होने के बाद अब आने वाली सरकारें केवल प्रशासनिक आदेश से पेंशन और सुविधाएं बंद नहीं कर सकेंगी। यदि कोई सरकार इस योजना को रोकना चाहेगी, तो उसे विधानसभा में बिल लाकर कानून में बदलाव करना होगा।

मीसा बंदियों की पेंशन और सुविधाएं अब तक केवल बीजेपी सरकारों के कार्यकाल में ही बहाल रही हैं। कांग्रेस सरकार आते ही इसे बंद कर देती है। 2023 में भजनलाल शर्मा के मुख्यमंत्री बनने के बाद 2024 में इस पेंशन को दोबारा शुरू कर दिया गया।

पात्रता जांचने के लिए जिला स्तर पर बनेगी कमेटी

लोकतंत्र सेनानियों को पेंशन देने की पात्रता जांचने के लिए जिला स्तर पर एक कमेटी बनाई जाएगी, जिसमें प्रशासनिक अधिकारी और विधायक शामिल होंगे। यह कमेटी पेंशन के लिए आवेदन करने वाले लोगों की पात्रता की जांच करेगी और अंतिम निर्णय लेगी।

बिल में यह भी प्रावधान किया गया है कि लोकतंत्र सेनानियों को कलेक्टर द्वारा एक आई-कार्ड जारी किया जाएगा। इसके जरिए उन्हें 15 अगस्त, 26 जनवरी और अन्य राष्ट्रीय पर्वों पर आयोजित होने वाले सरकारी समारोहों में विशेष रूप से आमंत्रित किया जाएगा।

कुछ और सुविधाएं जोड़ी जा सकती हैं

विधानसभा में इस बिल पर बहस के दौरान कई बीजेपी विधायकों ने सुझाव दिया कि लोकतंत्र सेनानियों के पति या पत्नी को भी मुफ्त यात्रा सुविधा दी जाए। इसके अलावा, जेल में रहने की अनिवार्य अवधि 30 दिन से घटाकर 10 दिन करने की भी मांग की गई।

बिल पर बहस का जवाब देते हुए संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने कहा कि यह बिल ऐतिहासिक है, क्योंकि 21 मार्च 1977 को ही आपातकाल समाप्त हुआ था। अब इस बिल के तहत नियम बनाए जाएंगे, जिनमें विधायकों के सुझावों को शामिल करने का प्रयास किया जाएगा।

कौन होते हैं मीसा बंदी और डीआईआर बंदी?

मीसा बंदी: 1975-77 के आपातकाल के दौरान राष्ट्रीय आंतरिक सुरक्षा अधिनियम, 1971 (मीसा एक्ट) के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों को मीसा बंदी कहा जाता है। यह कानून अब निरस्त हो चुका है।

डीआईआर बंदी: 1975-77 के दौरान भारत रक्षा नियम, 1971 (डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स) के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों को डीआईआर बंदी कहा जाता है। यह कानून भी अब निरस्त किया जा चुका है।

राजनीतिक विवाद… प्रभाव

इस बिल के पारित होने के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सरकार ने इसे लोकतंत्र सेनानियों के सम्मान और अधिकारों की रक्षा के रूप में प्रस्तुत किया है, जबकि विपक्ष इसे चुनावी लाभ के लिए उठाया गया कदम बता रहा है। इस मुद्दे पर आने वाले चुनावों में सियासी घमासान तेज होने की संभावना है।

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