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बस कंडक्टर की जिस बेटी ने पूरे समाज से लड़कर जीता था ऐतिहासिक ओलंपिक मेडल, वो अब बनी ‘नाइंसाफी’ की साक्षी

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आंखों में आंसू थे, जुबान लड़खड़ा रही थी, एक-एक शब्द बोलने में दिक्कत हो रही थी, फिर अचानक टेबल पर रखे जूते और कहा मैं कुश्ती से संन्यास लेती हूं. भारत की महिला पहलवान साक्षी मलिक ने रेसलिंग को अलविदा कह दिया है. बड़ी बात ये है कि साक्षी ने अपनी खुशी से खेल को नहीं छोड़ा, बल्कि उन्होंने नाइंसाफी का बड़ा आरोप लगाते हुए कुश्ती को अलविदा कह दिया. वो बेटी जिसने महिला कुश्ती की दुनिया में हिंदुस्तान को एक नया नाम दिया, वो बेटी जिसने ओलंपिक में पहली बार महिला कुश्ती में मेडल दिलाया, आखिरकार उसे ये फैसला क्यों लेना पड़ा? इस सवाल का जवाब भी साक्षी मलिक ने खुद ही दिया.

साक्षी का संन्यास

साक्षी मलिक के संन्यास की वजह रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के नए चीफ हैं. बुधवार को संजय सिंह भारतीय कुश्ती संघ के नए अध्यक्ष चुने गए जो कि बृजभूषण शरण सिंह के करीबी माने जाते हैं. बस इस चुनाव के नतीजे के तुरंत बाद ही देश के दिग्गज पहलवानों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और इस दौरान भावुक होते हुए साक्षी मलिक ने अपने संन्यास की घोषणा कर दी. साक्षी ने रोते-रोते कहा, हम 40 दिनों तक सड़क पर सोए, देश की कई जगहों से लोग उनके समर्थन में आए लेकिन अगर बृजभूषण का बिजनेस पार्टनर और करीबी अगर कुश्ती संघ का अध्यक्ष चुना जाएगा तो वो रेसलिंग से संन्यास लेती हैं.’

आखिर विवाद है क्या?

साक्षी मलिक और उनके साथी रेसलर्स दिल्ली में एक महीने तक सड़क पर धरने पर बैठे थे. मांग WFI के पूर्व चीफ बृजभूषण को पद से हटाने, उनपर केस दर्ज करने और गिरफ्तारी की थी. साथ ही ये भी डिमांड की गई कि रेसलिंग फेडरेशन के चुनाव में बृजभूषण के करीबी या रिश्तेदारों को हिस्सा नहीं लेने दिया जाए. बृजभूषण पर महिला पहलवानों के यौन शोषण और जान से मारने की धमकी के आरोप लगाए गए थे लेकिन वो अबतक किसी मामले में दोषी नहीं पाए गए हैं.

साक्षी हैं बेहद खास पहलवान

बता दें साक्षी मलिक देश के लिए बेहद ही खास पहलवान हैं. क्योंकि साक्षी ही वो खिलाड़ी हैं जिसने हिंदुस्तान को महिला रेसलिंग में पहला ओलंपिक मेडल दिलाया. साक्षी ने साल 2016 में रियो ओलंपिक में देश को कांस्य पदक जिताया था. साक्षी ने बड़े चमत्कारिक अंदाज में ये मेडल अपने नाम किया था. रेपेचाज़ में साक्षी 5-0 से पीछे चल रही थीं लेकिन उन्होंने कमाल की वापसी करते हुए 7-5 से मुकाबला अपने नाम किया. इस पदक को जीतने के बाद उनपर इनामों की बरसात हुई. यही नहीं भारत सरकार ने साक्षी को राजीव गांधी खेल पुरस्कार से भी नवाजा लेकिन विडंबना देखिए आज भारत की इस महिला पहलवान को रोते हुए संन्यास लेना पड़ा है.

साक्षी के लिए आसान नहीं था पहलवान बनना

साक्षी मलिक का ओलंपिक मेडल इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने इस पदक को हासिल करने के लिए सिर्फ अपनी विरोधी को ही नहीं हराया. बल्कि उन्होंने इस पदक को हासिल करने के लिए समाज से भी लड़ाई की. रोहतक के मोखरा गांव में जन्मी साक्षी ने जब पहलवानी शुरू की तो पूरा गांव उनके खिलाफ था लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इस खेल में अपना नाम बनाया. साक्षी के कोच ईश्वर सिंह दहिया ने अपनी शिष्या के लिए पूरे गांव से लड़ाई की और उनकी ट्रेनिंग भी जारी रखी. साक्षी ने लड़कों के साथ अखाड़े में दांवपेंच सीखे और आगे जाकर यही खूबी उन्हें ओलंपिक मेडल जिता गई.

गरीब परिवार से ताल्लुक

साक्षी मलिक एक गरीब परिवार की थीं. उनके पिता डीटीसी के बस कंडक्टर थे. वहीं उनकी मां आंगनवाड़ी में काम करती थीं. जिस परिवार में पैसों की कमी हो लेकिन इसके बावजूद उसकी बेटी पहलवानी में देश को ओलंपिक मेडल दिला दे तो सोचिए कितनी बड़ी बात है.

साक्षी की उपलब्धियां

साक्षी मलिक ने ओलंपिक में ब्रॉन्ज जीतने के अलावा 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर जीता, 2018 कॉमनवेल्थ में उन्हें ब्रॉन्ज मेडल मिला और 2022 बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने गोल्ड जीता. इसके अलावा उन्होंने एशियन चैंपियनशिप्स में भी 4 मेडल अपने नाम किये. लेकिन इन सब उपलब्धियों के बाद जिस तरह से साक्षी के करियर का अंत हुआ है वो सच में बेहद ही दुखद है.

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