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‘राजनीति में नहीं चमकी किस्मत, वसुंधरा से 36 का आंकड़ा…’कालवी को करणी सेना से मिली पहचान

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जयपुर: देश में राजूपत समाज के योगदान को जब भी याद किया जाएगा उनमें लोकेंद्र सिंह कालवी का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा, समाज के युवाओं के एक लड़ी में पिरोने वाले रोल मॉडल कालवी अब हमारे बीच नहीं रहे हैं जहां सोमवार रात जयपुर के एसएमएस अस्पताल में कालवी ने 80 साल की 80 आखिरी सांस ली. जानकारी के मुताबिक करणी सेना के संस्थापक का रात करीब 2 बजे हार्ट अटैक की वजह से निधन हो गया. कालवी का मंगलवार को 2:30 बजे नागौर जिले में उनके पैतृक गांव में अंतिम संस्कार किया जाएगा. वहीं इससे पहले कालवी के अंतिम दर्शन के लिए उनके पार्थिव शरीर को मंगलवार को राजपूत सभा भवन में रखा जाएगा जहां राजस्थान के कई नेता और समाज के लोग उन्हें श्रृद्धासुमन अर्पित करेंगे. करणी सेना की नींव रखने वाले कालवी अपने जीवन पर्यंत समाज के मुद्दों के लिए आवाज उठाते रहे और समाज के इतिहास को लेकर हर सरकार से डटकर मुकाबला किया. कालवी ने करीब 18 साल पहले 2006 में करणी सेना का गठन किया जहा बीकानेर के देशनोक में करणी माता मंदिर के नाम पर उन्होंने संगठन का नामकरण किया. कालवी इन सालों में समाज के मुद्दों पर विवाद और बॉलीवूड फिल्म ‘पद्मावत’, ‘वीर’, ‘जोधा अकबर’ के विरोध करने को लेकर चर्चा में रहे जहां उन्होंने फिल्मों से समाज के इतिहास से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया. वहीं कालवी के संगठन ने 2020 में आई ‘पद्मावत’ फिल्म को लेकर जमकर मोर्चा खोला था जिसके बाद करणी सेना देशभर की सुर्खियों में छाई रही.

राजनीति में नहीं चला कालवी का सिक्का

राजस्थान में 2003 के विधानसभा चुनावों के बाद जब अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने थे तब उस दौरान चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस के अलावा एक अन्य दल सामाजिक न्याय मंच भी मैदान में उतरा था जिसके पीछे लोकेंद्र सिंह कालवी ही थे. 2003 में सामाजिक न्याय मंच के अध्यक्ष देवी सिंह भाटी थे जिन्होंने बीजेपी छोड़ दी थी और राजपूत समाज के लिए आरक्षण की मांग को धार दी. वहीं चुनावों से पहले 18 सितम्बर 2003 को जब बीजेपी के कुछ नेता बीकानेर के कोलायत चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे तब गुलाब चन्द कटारिया की मौजूदगी में बीजेपी और सामाजिक न्याय मंच के कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए और दोनों के बीच जमकर लाठियां चली. वहीं इस दौरान वहां देवी सिंह भाटी के समर्थकों ने उनके जिंदाबाद के नारे लगाए. हालांकि कालवी ने बाद में इसे बीजेपी के घर की लड़ाई बताया लेकिन इसके बाद हुए चुनावों में सामाजिक न्याय मंच के सभी प्रत्याशी हार गए और केवल देवी सिंह भाटी ही जीत हासिल कर पाए थे. इसके अलावा कालवी के पिता कल्याण सिंह कालवी राज्य और केंद्र सरकार में कुछ समय में लिए मंत्री रहे और राजनीति उन्हें विरासत में मिली थी लेकिन वह इसमें कुछ कमाल नहीं कर सके. कालवी ने 1993 में नागौर और 1998 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने बाड़मेर-जैसलमेर सीट से बीजेपी के टिकट पर किस्मत आजमाई थी लेकिन दोनों ही बार उन्हें निराशा हाथ लगी.

कालवी और वसुंधरा की कभी नहीं बनी

वहीं पूर्व सीएम वसुंधरा राजे और कालवी के बीच हमेशा ही 36 का आंकड़ा रहा जहां राजे के राजस्थान के मुख्यमंत्री रहने के दौरान कालवी ने करणी सेना की रैलियां आयोजित की और आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन किया लेकिन राजपूत नेताओं के आपसी बिखराव के चलते वह इस मांग पर समाज को एकजुट नहीं कर पाए और सफलता हाथ नहीं लगी.इसके बाद वसुंधरा सरकार में गैंगस्टर आनंदपाल मुठभेड़ होने के बाद भी कालवी राजे से नाराज हो गए थे और कालवी ने बीजेपी को विधानसभा चुनाव 2018 में हराने की चुनौती तक दी थी. कालवी ने आनंदपाल फर्जी मुठभेड़ होने के बाद कहा था कि इस बार चुनावों में बीजेपी को हार का स्वाद चखाएंगे और राजे को राजपूत समाज कभी माफ नहीं करेगा.

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