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राजस्थान का ‘जलियांवाला बाग’, जहां जुटेंगे गहलोत-PM मोदी; कैसे होगी आदिवासियों की चांदी?

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राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के मानगढ़ धाम में एक नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मंच साझा करेंगे। यह मौका इसलिए खास है कि देश में नफरती माहौल को लेकर गहलोत लगातार प्रधानमंत्री पर निशाना साधते आए हैं और अपील करते आए हैं कि पीएम देश के लोगों से शांति की अपील करें। सवाल यह है कि आदिवासी अंचल के इस जलियांवाला बाग कहे जाने वाले मानगढ़ धाम में दोनों के बीच क्या इस मुद्दे पर बात होगी? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करेंगे? जिसकी गहलोत लगातार मांग करते आ रहे हैं।

खुद मोदी ने भी मुख्यमंत्री रहते हुए मानगढ़ धाम के लिए कहा था कि मानगढ़ को इतिहास में वो दर्जा नहीं मिल पाया है। बहरहाल दक्षिणी राजस्थान का जनजाति बहुल वागड़ अंचल आजादी के इतिहास की एक ऐसी घटना का गवाह है, जहां जलियांवाला बाग की तरह ही अंग्रेजों ने आदिवासियों का कत्लेआम किया था। महान संत गोविंद गुरु के नेतृत्व में 1500 आदिवासी गुरुभक्तों ने अपनी जान दी थी।

आदिवासी समुदाय का यह बलिदान आजादी के आंदोलन में दर्ज जलियांवाला बाग के बलिदान से बड़ा था और उससे भी पहले हो चुका था। लेकिन इतिहास में इस घटना को उचित दर्जा नहीं मिल सका। बांसवाड़ा जिले में आनंदपुरी से कुछ दूरी पर मानगढ़ धाम बना हुआ है। करीब 100 साल पहले 17 नवंबर 1913, में मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर गुरु का जन्मदिन मनाने के लिए एकत्र हुए हजारों गुरुभक्तों को ब्रिटिश सेना ने मौत के घाट उतार दिया था।

बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिले सहित गुजरात के सरहदी क्षेत्रों में गोविंद गुरु और शिष्यों द्वारा स्थापित धूणियां आज भी उस बलिदान की साक्षी हैं। गुजरात के झालोद तहसील की नटवा पंडेरफला धूणी, कंबोई धूणी, राजस्थान के बांसिया में मणी मगरी, धूणी मगरी छाणी मगरी धूणी, सुराता धूणी बेड़सा गांव में गनी माता की समाधि गोविंद गुरु और मानगढ़ धाम की घटना की गवाह है।

बलिदान के मौखिक दस्तावेजों के रूप में परिजनों की वाणियां उस लोमहर्षक घटना की वास्तविकता बताती हैं। इस घटना सुराता धूणी से जुड़े मोगाजी भगत, धीरा भाई भगत और हीरा भाई खांट शामिल थे। मानगढ़ के निकट गराडू गांव के वीका भाई डामोर मानगढ़ नरसंहार में शहीद हुए थे। इनके रिश्तेदार व गांव के लोग इनकी कुर्बानी की गाथा सुनाते हैं।

ऐसे थे गोविंद गुरु, वंश ने संभाली विरासत

गोविंद गुरु का जन्म डूंगरपुर जिले के बांसिया गांव में 20 दिसंबर 1858 को हुआ था। क्रांतिकारी संत गोविंद गुरु के बड़े बेटे हरिगिरि का परिवार बांसिया में छोटे बेटे अमरूगिरि का परिवार बांसवाड़ा जिले के तलवाड़ा के पास उमराई में बसा है। गोविंद गुरु के जन्म स्थान बांसिया में निवासरत परिवार की छठी पीढ़ी उनकी विरासत को संभाले हुए है। गोविंद गुरु के पुत्र हरिगिरि, उनके बेटे मानगिरि, उनके बेटे करणगिरि, उनके बेटे नरेंद्र गिरि और छठी पीढ़ी में उनके बेटे गोपालगिरि मड़ी मगरी पर रहकर गुरु के उपदेशों को जीवन में उतारने का संकल्प प्रचारित कर रहे हैं।

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