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20 साल बाद रेप पीड़िता को इंसाफ! पूर्व बीजेपी MLA को 89 की उम्र में 10 साल की जेल

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पीड़ित न्याय के लिए न्यायालयों का रुख करता है जहां उसे उम्मीद होती है कि न्याय के मंदिर में उसे इंसाफ जरूर मिलेगा लेकिन कब मिलेगा इसकी कोई मियांद नहीं होती है…लंबी प्रक्रिया, हजारों बहस, सैकड़ों बयान के बाद ना जने कितने बरस बाद आखिरकार उसके अरमान लगभग टूट जाते हैं तब जाकर कोर्ट का फैसला आता है. कुछ ऐसा ही राजस्थान के नागौर जिले के मकराना में हुआ जहां रेप के एक 20 साल पुराने मामले में एडीजे कोर्ट ने मकराना के पूर्व विधायक भंवरलाल राजपुरोहित को 10 साल की सजा सुनाते हुए एक लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया है. जिस समय फैसला सुनाया जा रहा था उस दौरान 89 साल का पूर्व विधायक भंवरलाल राजपुरोहित कोर्ट में ही मौजूद था जिसे आदेश आते ही पुलिस ने तुरंत गिरफ्तार कर लिया और परबतसर जेल भेज दिया गया. बता दें कि 22 साल पहले हुआ यह रेप का मामल उस दौरान काफी चर्चा में रहा था और राजस्थान की राजनीति में भूचाल आ गया था. वहीं रेप केस दर्ज होने के बावजूद भी भंवरलाल बीजेपी से मकराना के विधायक चुने गए थे. मालूम हो कि भंवरलाल पर जब दुष्कर्म का केस लगा तब वह 66 साल का था और अब वह 89 साल का हो चुका है.

22 साल की महिला से किया दुष्कर्म

मामले के मुताबिक मनाना गांव की रहने वाली 22 साल की एक महिला ने लिखित में शिकायत देकर 1 मई 2002 को विधायक के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई थी जिसमें कहा गया था कि वह 29 अप्रैल 2002 को दोपहर करीब तीन बजे भंवरलाल राजपुरोहित के कुएं पर गई थी जहां उस दिन भंवरलाल की पत्नी घर पर नहीं थी और कुएं पर पानी भरने के बाद भंवरलाल ने उसे कमरे के अंदर बुलाया. वहीं महिला ने आरोप लगाया था कि कमरने के अंदर ले जाकर भंवरलाल ने उसके साथ दुष्कर्म किया. वहीं रिपोर्ट में कहा गया है कि रेप के बाद महिला गर्भवती हो गई थी जिस पर उसका अबॉर्शन भी हुआ था. यह केस पिछले 20 साल से अपर सेशन न्यायालय (एडीजे कोर्ट) में चल रहा था जहां एडीजे कुमकुम ने अब जाकर आरोपी को सजा सुनाई है.

डेढ़ साल बाद ही बन गया विधायक

वहीं भंवरलाल के खिलाफ रेप का मामला दर्ज होने के करीब डेढ़ साल बाद अक्टूबर 2003 में राजस्थान में विधानसभा चुनाव हुए जहां बीजेपी ने भंवरलाल को मकराना से अपना प्रत्याशी बनाया और वह चुनाव जीत गया. बता दें कि महिला के आरोपों पर मामले की जांच कर रहे तत्कालीन पुलिस निरीक्षक तेजपाल सिंह ने 4 महीनों में ही मामले को झूठा करार देते हुए 16 अगस्त 2002 को कोर्ट में एफआर लगा दी थी. इसके बाद 2003 में राजपुरोहित विधायक भी बन गया था लेकिन एफआर लगने के बाद पीड़िता ने फिर कोर्ट की शरण ली और बाद में कोर्ट ने इसमें संज्ञान लेते हुए वापस जांच के आदेश दिए और इसके बाद मामला मकराना कोर्ट में चला और सुनवाई के दौरान पीड़िता, उसके माता- पिता, दो डॉक्टर और जांच अधिकारी के बयान हुए.

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