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मानेसर वाली बगावत होगी पैमाना, रणभूमि बनेगी दौसा; गुर्जर एकजुटता वाली चुनौती और कसौटी पर होंगे खुद पायलट

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जयपुर: सचिन पायलट ने क्या तय किया है ये तो वही जानते हैं, क्योंकि राजस्थान कांग्रेस के प्रभारी रंधावा और पायलट दोनों की बातों में ज़मीन आसमान का फ़र्क है. रंधावा कहते हैं सब ठीक है, लेकिन पायलट और उनके समर्थकों के तेवर बार-बार 11 जून की ओर इशारा कर रहे हैं. ज़ाहिर है, ये मौक़ा न सिर्फ़ राजेश पायलट की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करने का है, बल्कि पायलट के लिए शक्ति प्रदर्शन का एक और ज़रिया हो सकता है. 11 जून 2023 को पायलट और उनके समर्थक क्या करेंगे, ये पत्ते तो अभी नहीं खुले हैं, लेकिन सचिन पायलट ने अपने इरादे ज़ाहिर कर दिए हैं. जिन मांगों को लेकर वो जनसंघर्ष यात्रा निकाल चुके हैं, उन मुद्दों से पीछे हटने के लिए कतई तैयार नहीं हैं. यानी मतलब साफ है कि पायलट पीछे नहीं हटेंगे. हालांकि, वो 11 जून को कितना आगे तक जाएंगे, इसे लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं.

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नई पार्टी या पुराना आंदोलन, क्या है पायलट का प्लान?

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राजस्थान कांग्रेस के लिए 11 जून का दिन बड़ा तूफ़ान ला सकता है, जिसके संकेत सचिन पायलट लगातार दे रहे हैं. उनका कहना है कि वो राज्य के युवाओं समेत यहां की जनता को लेकर किए गए वादों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाएंगे. हालांकि, दिक्कत ये है कि उनकी ये हद अपने ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की दहलीज़ से शुरू होकर उनकी कुर्सी तक पहुंचती है. यानी पायलट की जो भी मांगें हैं, उन्हें लेकर हर बार गहलोत सरकार पर ही निशाना साधा जा रहा है. अगर मुख्यमंत्री गहलोत ये सारी मांगें मान लेते हैं, तो पायलट के पॉलिटिकल प्रेशर का संदेश पूरे राज्य में जाएगा. लेकिन अगर वो ऐसा नहीं करते, जैसा कि अब तक देखा गया है, तो समझिए कि पायलट को अपने तेवर और तीखे करने होंगे. ख़बर है कि सचिन पायलट राजस्थान की जनता की मांगों के बहाने गहलोत और हाई कमान दोनों पर ये दबाव बनाना चाहते हैं कि या तो उनके साथ अभी कोई डील हो जाए. ऐसी डील जिस पर चुनाव के बाद सत्ता आने पर मुहर लगे या पार्टी हाई कमान उस डील से संबंधित कोई बड़ा ऐलान कर दे. हालांकि, ये दोनों ही बातें फिलहाल पूरी होती नहीं नज़र आ रही हैं.

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मानेसर वाली ‘महाभारत’ से बड़ी होगी दौसा वाली ‘बग़ावत?

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20 मई 2020 को मानेसर में सचिन पायलट की बग़ावत को मुख्मयंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस हाई कमान कभी नहीं भूल पाएंगे. उस वक़्त पायलट ने पूरी पार्टी और गहलोत सरकार को सदमा दिया था. उस वक़्त पायलट के बाग़ी खेमे में 30 विधायकों का दावा किया जा रहा था. हालांकि, पहुंचे थे सिर्फ़ 19 विधायक. यानी जिन लोगों पर भरोसा करके पायलट ने बग़ावत का बीड़ा उठाया था, उनमें से 11 विधायकों ने गहलोत कैम्प का रुख़ कर लिया था. तभी से ये माना जा रहा था कि गहलोत की सियासत में जादूगरी अभी बाक़ी है. इसीलिए, वो पायलट गुट के 11 विधायकों को बग़ावत से अलग करने में कामयाब रहे. अब मानेसर वाली बग़ावत के 3 साल बाद 11 जून 2023 को पायलट एक बार फिर बाग़ी तेवर दिखाएंगे. ये भी तय है कि दौसा वाली बग़ावत की तुलना मानेसर वाली बग़ावत से ज़रूर होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि पायलट मानेसर से दौसा तक के बाग़ी सफ़र में 30 के मुक़ाबले 15 विधायकों का साथ गंवा चुके हैं. हालांकि, अब भी पायलट खेमे की ओर से दावा किया जा रहा है कि उनके पास 30 के आस-पास विधायक हैं, जिनमें कुछ मंत्री भी हैं. लेकिन, हक़ीक़त ये है कि सचिन पायलट के पास सिर्फ़ 15 विधायकों का साथ बचा है.

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गुर्जरों की एकजुटता ही आख़िरी दांव!

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सचिन पायलट जिस गुर्जर बिरादरी से आते हैं, उसका वोट बैंक राजस्थान में क़रीब 5 प्रतिशत है. लेकिन, बिरादरी के लोगों का असर क़रीब 40 सीटों पर है. इसलिए 200 विधानसभा सीटों वाले राजस्थान में इतनी सारी सीटों पर असर रखने वालों को कोई भी दल नाराज़ नहीं करना चाहता. यही वजह है कि अब तक चाहकर भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत या कांग्रेस हाई कमान सचिन पायलट के ख़िलाफ़ बड़ा एक्शन नहीं ले सकी है. गुर्जर समाज के बीच राजेश पायलट की लोकप्रियता के बाद सचिन पायलट ने वो सेहरा अपने सिर पर बांधने के लिए सब कुछ दांव पर लगा रखा है. वो हर बार गहलोत से भिड़ने के दौरान गुर्जर बिरादरी का दमखम दिखाने की हुंकार भरते रहे हैं. ऐसे में न तो मुख्यमंत्री गहलोत और ना ही हाई कमान पायलट को दरकिनार करने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं. शायद इसीलिए 11 जून को अपने पिता की पुण्यतिथि के मौक़े को सचिन पायलट ने ‘पावर पॉलिटिक्स’ का ‘साइलेंट हथियार’ बनाने का इशारा दे दिया है. 11 जून को अपने गृह नगर दौसा की धरती पर गुर्जरों की एकजुटता और संख्या बल ही पायलट, गहलोत और हाई कमान के लिए बड़ा संदेश देगी.

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3 साल से जारी बग़ावत का ‘फ़ाइनल टाइम’ आ गया!

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2020 से लेकर अब तक सचिन पायलट लगातार बाग़ी तेवर दिखाते रहे हैं. लेकिन ये भी सच है कि पिछले तीन साल में वो मज़बूत होने के बजाय विधायकों की संख्या बल के मामले में कमज़ोर हुए हैं. 2020 में 30 विधायकों का दावा करने वाले पायलट के पास अब आधे विधायकों का साथ बचा है. यानी तीन साल में उनके खेमे वाले 15 विधायक या तो गहलोत की शरण में जा चुके हैं या न्यूट्रल हो चुके हैं. ऐसे में सवाल ये है कि क्या वो अपने ही उठाए हुए बग़ावत के तूफ़ान को पिछली बार से बड़ा कर पाएंगे या इस बार उनकी बग़ावत छोटे भंवर की तरह शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाएगी.

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