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जड़ों से दूर गया समाज अपने सामर्थ्य को ही भूल जाता हैः पीएम मोदी

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दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित भारत मंडपम में गुरुवार, 8 फरवरी को आचार्य श्रील प्रभुपाद की 150वीं जयंती पर वर्ल्ड वैष्णव कन्वेंशन का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने भी हिस्सा लिया. पीएम ने प्रभुपाद की स्मृति में सिक्का और पोस्टल स्टैम्प जारी करते हुए लोगों का धन्यवाद किया और कहा कि यह उनके लिए बहुत बड़ा सौभाग्य है. पीएम ने कहा कि कोई समाज जब अपनी जड़ों से दूर हो जाता है तो सबसे पहले अपने सामर्थ्य को भूल जाता है. इसका सबसे बड़ा प्रभाव ये होता है कि जो हमारी खूबी होती है, जो हमारी ताकत होती है… हम उसे लेकर हीन भावना का शिकार होते हैं. आगे पॅाइंट में पढ़ें पीएम में कार्यक्रम में क्या-क्या कहा…..

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  • पीएम ने कहा, “आप सब के यहां पधारने से भारत मंडपम की भव्यता और बढ़ गई है. इस भवन का विचार बस्सी टोक भगवान के अनुभव मंडप से जुड़ा है. ये अनुभव मंडप्पम प्राचीन भारत में आध्यात्मिक विमर्शों का केंद्र था. अनुभव जनकल्याण की भावना और संकल्पों का दर्जा था. आज श्रील भक्ति सिद्धांत गोस्वामी जी की 150वीं जयंती के अवसर पर भारत मंडपम में ऐसे ही ऊर्जा दिखाई दे रही है. यह भवन भारत की आधुनिक सामर्थ्य और भारत के मूल्यों दोनों को दर्शाता है. कुछ महीने पहले ही जी 20 समिट के जरिये यहां से नए भारत के सामर्थ्य का दर्शन हुए थे और आज इसके वर्ल्ड वैष्णव कन्वेंशन को आयोजित करने और इसका इतना पवित्र सौभाग्य मिल रहा है और यही दौर नए भारत की तस्वीर है. जहां विकास भी होगा और विरासत भी है, दोनों का संगम है. जहां आधुनिकता का स्वागत भी है और अपनी पहचान पर गर्व भी है.”
  • पीएम मोदी ने कहा. “यह मेरा सौभाग्य है कि इस पुण्य आयोजन में संतों के बीच में मैं उपस्थित हूं. मैं अपना सौभाग्य मानता हूं कि आपमें से कई संतों के साथ मेरे निकट संबंध रहा है. मुझे अन्य कई बार आप सबका सान्निध्य मिला है. मैं शील भक्ति सिद्धान्त पर श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए उन्हें आदरांजलि देता हूं. मैं प्रभुपाद के अनुयायियों को उनकी 150वीं जयंती पर शुभकामनाएं देता हूं. उन्होंने इस अवसर पर प्रभुपाद की स्मृति में postal stamp और स्मारक सिक्का जारी किया. पीएम ने कहा कि पूज्य संत प्रभुपाद की जयंती हम ऐसे समय मना रहे हैं, जब हमारा सैकड़ों साल पुराना सपना पूरा हुआ है. आज चेहरे पर जो उल्लास और उत्साह दिखाई दे रहा है. मुझे विश्वास है इसमें रामलला विराजमान होने का खुशी भी शामिल है.”
  • पीएम मोदी ने कहा, “इतना बड़ा महायुद्ध संतों की साधना से उनके आशीर्वाद से जुड़ा हुआ है. साथ ही हम सब आज अपने जीवन में कृष्ण लीलाओं और भक्ति की तथ्यों को इतनी सहजता से समझते हैं. इस युग में इसके पीछे चैतन्य महाप्रभु की कृपा की बहुत बड़ी भूमिका है. चैतन्य महाप्रभु कृष्ण प्रेम के प्रतिमान थे. उन्होंने अध्यात्म और साधना को जनसाधारण के लिए सरल बनाया है. उन्होंने बताया कि ईश्वर की प्राप्ति केवल संन्यास से नहीं उल्लास से भी हो सकती है.”
  • पीएम मोदी ने कहा, “मैं अपना अनुभव बताता हूं, मैं इस परंपराओं में पला बढ़ा इंसान हूं. मेरे जीवन की जो अलग-अलग पड़ाव पर एक पड़ाव कुछ और ही था. रोज माहौल में बैठता था, बीच में आता था, वहां भजन कीर्तन में मैं एक कोने में बैठा रहता था. मन भर जाता था, लेकिन जुड़ता नहीं था. बैठा रहता था और इसके बाद जब मैं भजन कीर्तन में बैठने लगा तो खुद भी ताली बजाना… मैंने चैतन्य महाप्रभु कि इस परंपरा में वहां ताली बजा रहा था… वो कोई पीएम नहीं भक्त ताली बजा रहा था.”
  • पीएम मोदी ने कहा, ” चैतन्य महाप्रभु ने हमें दिखाया है कि श्री कृष्ण की लीलाओं को, उनके जीवन को उत्सव के रूप में अपने जीवन में उतार कर कैसे सुखी हुआ जा सकता है. कैसे संकृतन, गीत और भजन से अध्यात्म की शीर्ष पर पहुंचा जा सकता है. आज कितने ही साधक ये प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे है. इसके अनुभव का आनंद होता है. मुझे उसका साक्षात्कार हुआ है. चैतन्य महाप्रभु ने मुझे श्रीकृष्ण की लीलाओं को भी समझाया और जीवन के लक्ष्य को जानने के लिए कि उसका महत्व भी हमें बताया. इसलिए भक्ति में आज जैसी आस्था ग्रंथों के प्रति है वैसा ही प्रेम भक्तमाल के लिए भी है.”
  • पीएम मोदी ने कहा, “चैतन्य महाप्रभु की वीर विभूतियां समय के अनुसार किसी न किसी रूप से हमें आगे बढ़ते हैं. शैलभक्ति सिद्धांत प्रभुपाद के संकल्पों की प्रतिमूर्ति है. जो साधना से सिद्धि तक पहुंचाता है और परमार्थ तक की यात्रा होती है. श्री शील भक्ति के सिद्धान्त जीवन में हमें पग-पग देखने को मिलता है. 10 साल से कम उम्र में प्रभुपाद ने पूरी गीता कंठस्थ कर ली. किशोरावस्था में उन्होंने आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ संस्कृत व्याकरण वेद-वेदांग में विद्वता हासिल कर ली. उन्होंने ज्योतिष गणित में सूर्य सिद्धांत जैसे ग्रंथों की व्याख्या की. सिद्धांत सरस्वती की उपाधि हासिल किए, प्रभुपाद ने 24 वर्ष की उम्र में संस्कृत स्कूल भी खोल लिया. अपने जीवन में स्वामी जी ने 9 से अधिक किताबें लिखी, सैकड़ों लेख लिखे हैं, लाखों लोगों को दिशा दिया. उन्होने एक प्रकार से ज्ञान मार्ग और भक्तिमार्ग दोनों को संतुलित कर जीवन व्यवस्था से जोड़ दिया.”
  • पीएम मोदी ने कहा, “वैष्णव जन तो तेने कहिए जो पीर पराई जाने… उन्होंने कहा कि इस भजन से गांधीजी जिस वैष्णव भाव का गान करते थे. श्री प्रभुपाद स्वामी ने उस भाव को अहिंसा और प्रेम के उस मानवीय संकल्प को देश -विदेश में पहुंचाने का काम किया.” पीएम ने कहा कि उनका जन्म तो गुजरात में हुआ. वैष्णव भाव कहीं भी जगे गुजरात उससे जरूर जुड़ जाता है. खुद भगवान कृष्ण मथुरा में अवतरित होते हैं, लेकिन अपनी लीलाओं का विस्तार देने के लिए द्वारका आते हैं. मीरा बाई जैसी महान कृष्ण भक्त राजस्थान में जन्म लेती है लेकिन एकाकार होने के लिए गुजरात चली जाती हैं. ऐसे कितने ही वैष्णव संत हैं जिनकी गुजरात की धरती से द्वारका से विशेष नाता रहा. गुजरात संत कवि नरसिंह मेहता उनकी भी जन्मभूमि है. इसलिए श्रीकृष्ण से संबंध चैतन्य महाप्रभु की परंपरा ही मेरे लिये जीवन का सहज स्वाभाविक हिस्सा है.
  • पीएम मोदी ने कहा, “2016 में गौड़ीय मठ की शताब्दी समारोह में आप सबके बीच में आया था, उस समय मैंने आपके बीच भारत की आध्यात्मिक चेतना पर विस्तार से बात की थी. कोई समाज जब अपनी जड़ों से दूर हो जाता है तो सबसे पहले अपने सामर्थ्य को भूल जाता है. इसका सबसे बड़ा प्रभाव ये होता है कि जो हमारी खूबी होती है, जो हमारी ताकत होती है… हम उसे लेकर हीन भावना का शिकार होते हैं. भारत की परंपरा में… हमारी जीवन में भक्ति महत्वपूर्ण दर्शन दी. इससे अछूता नहीं रहा. यहां बैठे युवा साथी मेरी बात से कनेक्ट कर पाएंगे. जब भक्ति की बात आती हैं तो कुछ सोचते हैं कि भक्ति भावना आधुनिकता और विरोधाभासी बातें है. ईश्वर की भक्ति हमारे ऋषियों का दिया हुआ महान दर्शन है.”
  • पीएम ने आगे कहा, “भक्ति हताशा नहीं आशा और आत्मविश्वास है, उत्साह-उमंग है. राग और विराग के बीच जीवन में चैतन्य का भाव भरने का सामर्थ होता है. भक्ति युद्ध के मैदान में खड़े श्री कृष्ण में जो गीता के बारहवें अध्याय में एक महान योग बताते हैं, जब युद्ध में निराश हो चुके अर्जुन अन्याय के खिलाफ अपना गांडीव उठा लेते हैं. इसलिए भक्ति भाव नहीं प्रभाव का संकल्प है. उन्होंने कहा कि यह विजय हमें दूसरों पर नहीं, हमें अपने ऊपर हासिल करनी है. हमें युद्ध भी अपने लिए नहीं धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र की धारणा से मानवता के लिए लड़ना है. और यही भावना हमारी संस्कृति में हमारी रगों में रची बसी हुई है. इसलिए भारत कभी सीमाओं के विस्तार के लिए दूसरे देशों पर हमला करने नहीं गया. जो लोग इतने महान दर्शन से अपरिचित थे. उनके वैचारिक हमलों में कहीं न कहीं हमारे मानस को भी प्रभावित किया. लेकिन हम सभी प्रभुपाद जैसे संतों के ऋणी हैं. उन्होंने करोड़ों लोगों को पुनः सच के दर्शन कराए हैं.”
  • पीएम ने कहा, “आज आजादी के अमृत काल में गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का संकल्प देश को आगे बढ़ा रहा है. आप सभी भक्ति मार्ग से भली भांति परिचित हैं. हमारे भक्ति मार्ग के संतों का योगदान आजादी के आंदोलन में भी था. भक्ति आंदोलन की भूमिका अमूल्य रहा है. भारत की हर चुनौती पूर्ण काल खंड में कोई न कोई महान संतों और आचार्य ऋषि मुनि किसी न किसी रूप में दिशा देने के लिए सामने आए. मध्य काल के मुश्किल दौर में जब हार भारत को हताशा थी, तब भक्ति आंदोलन के संत तूने तो हमें हारे को हरिनाम मंत्र दिया. संतों ने हमें सिखाया की समर्पण केवल परम सत्ता के सामने करता हूं. संतों ने हमें त्याग और जीवन में अपने मूल्यों की रक्षा करना सिखाया.
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