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दिलीप कुमार के बड़े फैन थे मनोज कुमार, अपना नाम उनकी एक फिल्म के किरदार पर रखा

रिपोर्ट टाइम्स।

अपने समय के प्रसिद्ध अभिनेता और निर्माता-निर्देशक मनोज कुमार का मूल नाम वैसे तो हरिकिशन गिरि गोस्वामी था, लेकिन उनका नाम मनोज कुमार क्यों और कैसे पड़ा, इसकी एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है. यह कहानी बताती है मनोज कुमार वास्तव में कितने बड़े फिल्म प्रेमी व्यक्ति थे.

आमतौर पर हमारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कई ऐसे कलाकार हुए जिन्होंने पर्दे पर तो अपने अभिनय और ग्लैमर का जादू बिखेरा लेकिन वास्तविक जिंदगी में सिनेमा उनके लिए बड़ी चीज़ नहीं रही. लेकिन देव आनंद की तरह की मनोज कुमार भी ऐसे कलाकार कहलाये जो सिनेमा की कला से मोहब्बत करते थे. हमेशा फिल्म की कहानी और किरदारों में खोये रहते थे. पिछले काफी समय से अस्वस्थ थे लेकिन उनसे मिलने वाले कहते थे मनोज कुमार अब भी फिल्म बनाने की सोच रहे हैं. अपना सबसे बेस्ट देना चाहते हैं.

जैसा कि मनोज कुमार ने खुद ही कई बार अनेक इंटरव्यूज में बताया था कि उनमें फिल्मों के प्रति आकर्षण बचपन से ही था. किशोरावस्था में नाटकों में हिस्सा लिया करते थे. दिखने में लंबे और हैंडसम थे, अभिनय करना चाहते थे. उनके प्रशंसक उन्हें मुंबई जाकर फिल्मों में भाग्य आजमाने के लिए भी कहते.

लिहाजा उन्होंने मुंबई का रुख किया. फिल्म बनाने की चाह उनमें आखिरी समय तक बनी रही. मनोज कुमार ऐसे कलाकार थे, जिनको लेकर कई जिज्ञासाएं हैं. उनमें उनके नाम को लेकर सबसे ज्यादा जिज्ञासा रही है. साल 2015 के दादा साहेब फाल्के सम्मान प्राप्त करने के लिए मनोज कुमार जब दिल्ली आये थे, तब उनके संक्षिप्त किंतु सारगर्भित मुलाकात हुई. इस दौरान उनसे कुछेक सवाल पूछे.

हरिकिशन गिरि गोस्वामी ने क्यों बदला नाम?

उन सवालों में एक सवाल उनके फिल्मी नाम को लेकर भी था. उन्होंने मनोज कुमार नाम को कैसे अपनाया. हरिकिशन गिरि गोस्वामी से मनोज कुमार केसै बने. इस सवाल पर वो बचपन के दिनों में खो गये. कहा- मैं तब शायद करीब बारह साल का रहा हूंगा. फिल्में खूब देखता था. मुझे कई सितारे पसंद थे. लेकिन दिलीप साहब ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया. उन्हीं दिनों उनकी फिल्म लगी थी- शबनम. यह फिल्म सन् 1949 में आई थी. देश को आजाद हुए महज दो साल हुए थे.

युवाओं के सामने नये-नये सपने सज रहे थे. सिनेमा का पर्दा भी उनके सपनों का आईना था. इस फिल्म में दिलीप कुमार के कैरेक्टर का नाम था- मनोज कुमार. उन्होंने बताया कि- वह नाम उनको बहुत पसंद आया. चूंकि मुझे भी हीरो बनने की इच्छा थी इसलिए मन में ठान लिया कि जब एक्टर बनूंगा तो स्क्रीन पर यही नाम रखूंगा.

दिलीप कुमार की फिल्म से आया आइडिया

उन दिनों दिलीप कुमार के अलावा मनोज कुमार के पसंदीदा कलाकार थे- अशोक कुमार और कामिनी कौशल. अपने नाम में कुमार लगाने का शौक दिलीप कुमार और अशोक कुमार के नाम से ही हुआ. शबनम उन्होंने बार-बार देखी. दिलीप कुमार और कामिनी कौशल के साथ अन्य कलाकार थे- जीवन और श्यामा. एसडी बर्मन के संगीत में फिल्म में दस गीत थे. तुम्हारे लिए हुए बदनाम…, तू महल में रहने वाली…, किस्मत में बिछड़ना था…, इक बार तू बन जा मेरा…, प्यार में तुमने धोखा सीखा…, मेरा दिल तड़पा के कहां चला…, हम किस को सुनाएं हाल…, देखो आई पहली मोहब्बत की रात… वगैरह काफी हिट थे.

ये तो कहानी रही मनोज कुमार नाम की, लेकिन आपका एक नाम भारत कुमार भी काफी मशहूर है. आखिर उसके पीछे क्या राज है? यह नाम आपने कब और कैसे रखना चाहा? मनोज कुमार ने इस सवाल के जवाब में कहा कि ये बात तब की है जब शहीद फिल्म का प्रीमियर हुआ था. इस फिल्म में मनोज कुमार ने शहीद भगत सिंह का रोल निभाया था. चेतन आनंद की हकीकत के बाद देशभक्ति फिल्मों की शृंखला में यह काफी अहम स्थान रखती है.

जय जवान, जय किसान : नया नारा

शहीद फिल्म के प्रीमियर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को आमन्त्रित किया था. शास्त्री जी ने वह फिल्म देखी. उन्होंने मनोज कुमार की खूब प्रशंसा की. इसके एक दिन बाद शास्त्री जी ने मनोज कुमार को अलग से मिलने के लिए बुलाया और कहा कि देखो- मैंने एक नया नारा दिया है- जय जवान. जय किसान. क्या इस पर कोई फिल्म बन सकती है?

शास्त्री जी के सवाल पर मनोज कुमार ने तुरंत सहमति जताई और आशीर्वाद मांगा. वादा किया कि इस नारे पर जरूर फिल्म बनाएंगे. इसके बाद उपकार का सृजन हुआ, जिसमें मनोज कुमार का नाम भारत कुमार था. उपकार फिल्म से जुड़ी पूरी कहानी फिर कभी. फिलहाल ये बता दें कि मनोज कुमार का जन्म अविभाजित भारत के ऐबटाबाद में सन् 1937 की 24 जुलाई को हुआ था.

खुद हीरो बने, कइयों को भी हीरो बनाया

महज 10 साल की उम्र में ही भारत-पाकिस्तान विभाजन की विभीषिका के शिकार हुए. उनका पूरा परिवार काफी समय तक दिल्ली के किंग्सवे कैंप के विजयनगर में शरणार्थियों की बस्ती में रहा. बाद में करोलबाग से पूसा रोड के पास ओल्ड राजिंदर नगर में बसेरा बनाया. दिल्ली से मुंबई हीरो बनने तो चले लेकिन आगे चलकर अपने साथ कई और कलाकारों को भी हीरो बनाया. कई कलाकारों को मुंबई में टिकने की प्रेरणा दी, ये कहानियां फिर कभी.

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