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राजस्थान दिवस विशेष:राजस्थान के प्राचीन वैभव, इतिहास और कला से रूबरू कराती प्राचीन हवेलियां, खोती जा रही सांस्कृतिक विरासत

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एक समय था जब ये आबाद रहा करती थी। लेकिन अनदेखी का शिकार हुआ एक वैभवशाली, सांस्कृतिक और विरासती इतिहास धुंधला होता नजर आ रहा है। जी हां हम बात कर रहे हैं अपने आप में इतिहास को समाये प्राचीन हवेलियों की। कभी आबाद रहने वाली इन हवेलियों के मालिक कमाने के लिए बाहर निकले और फिर प्रवासी ही बन गए। एक-दो हवेलियों को छोड़ कर ज्यादातर हवेलियां ऐसी है जिनकी सार-संभाल नहीं हो रही। ऐसे में वे जर्जर हो चुकी हैं और गिरने के कगार पर है।

कई दशकों का संजोए है इतिहास-

इन हवेलियों में सैकड़ों साल का इतिहास समाया है। इनमें ज्यादातर हवेलियां 100 से 200 साल तक पुरानी है। इन हवेलियों को उस समय परिवार की स्थिति और शाही अंदाज दिखाने के लिए सेठ-साहूकारों द्वारा बनवाया गया था। एक दौर ऐसा था जब शानो-शौकत दिखाने का जरिया ये हवेलियां बन गई। जब सेठ-साहूकार इन हवेलियों से बाहर निकलते थे तो उनका अंदाज भी शाही रहता था।

कई पीढ़ियां रहती थी एक साथ-

हवेलियों की बनावट उस समय सामूहिक परिवार की अवधारणा को लेकर किया गया था। एक हवेली में कई कमरे होते थे। इन कमरों की ऊंचाई भी करीब 15 से 20 फुट रखी गई। वहीं चूना पत्थर के इस्तेमाल के चलते आज भी इन हवेलियों में गर्मी के दिनों में भी कमरों में ठंडक रहती है। वहीं हवेलियों में शाल के पेड़ की लकड़ियों को गाटर की जगह काम में लिया गया है।

आज भी जीवंत है चित्रकला शैली-

प्राचीन हवेलियों की खासियत उनके बाहर खास शैली में की गई चित्रकारी भी है। माटी से बनाए गए कलर से की गई फ्रेस्को पेंटिंग आज भी कई हवेलियों पर कायम है। इनमें भारत के पौराणिक इतिहास से लेकर राजा-महाराजाओं के समय को भी उकेरा गया है। इसके अलावा आधुनिकता में रेल जैसे आविष्कारों और युद्ध दृश्यों को भी चित्रकारी के माध्यम से हवेलियों की दीवारों पर उकेरा गया है। ये सुंदरता हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है।

बाहर नाम कमा रहे हवेलियों के मालिक-

ज्यादातर हवेलियों के मालिकों ने व्यापार के लिए बाहरी इलाकों का रुख किया। कोलकाता, मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली सहित देशभर में विभिन्न इलाकों में उद्योग धंधे स्थापित कर यहां के उद्योगपतियों ने काफी नाम क्षेत्र का किया है। इनमें से कई हवेलियों की नियमित देखरेख हो रही है। लेकिन कई हवेलियां ऐसी भी है जिनकी अनदेखी हो रही है।

खोती जा रही सांस्कृतिक विरासत-

हवेलियों की सार-संभाल की ओर उनका ध्यान नहीं है। ऐसे में सांस्कृतिक विरासत खोती जा रही है। साझे परिवार की अवधारणा को मजबूत करने के साथ ही प्राचीन इतिहास से रूबरू करवाने वाली हवेलियों के साथ ही कई मंदिर भी स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं। लेकिन ये भी फिलहाल अनदेखी के चलते धीरे-धीरे इतिहास में समाते नजर आ रहे हैं। वहीं कई हवेलियों पर भूमाफियों की नजर भी पड़ चुकी है। कुछ हवेलियों को तो तोड़ भी दिया गया है। अब बची हुई हवेलियां भी खतरे में हैं।

संरक्षण की है दरकार-

ये सभी हवेलियां पर्यटन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं। इनको राज्य सरकार से संरक्षण मिले तो इन हवेलियों की सार-संभाल हो सकती है। सरकार प्रवासीजनों से बात कर इन हवेलियों की देखरेख का जिम्मा लेकर इन्हें पर्यटन स्पॉट के रूप में काम में ले सकती है। इससे राज्य में पर्यटन को बढ़ावा भी मिलेगा और हमारी प्राचीन विरासत भी संरक्षित हो सकेगी। अब देखना ये होगा कि सरकार की नजरें कब इन हवेलियों पर इनायत होगी।

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