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दबई सीट पर BSP को मिली थी जीत, इस बार भी त्रिकोणीय मुकाबले के आसार

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राजस्थान का भरतपुर जिला प्रदेश की राजनीति में अपना अलग ही मुकाम रखता है. भरतपुर जिले की नदबई विधानसभा सीट ऐसी है जहां कांग्रेस की पकड़ कमजोर मानी जाती है. साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत किसी भी पार्टी की इस सीट पर पकड़ मजबूत नहीं है. वर्तमान में नदबई सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय होने के आसार हैं. 2018 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने जीत हासिल की थी. हालांकि बसपा से जीतने वाले विधायक जोगिंदर सिंह अवाना अब कांग्रेस में चले गए हैं. साल 1972 से लेकर 2018 तक कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी की महज दो बार ही जीत नसीब हुई है. एक तो 1972 में नत्था सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की थी उसके बाद 1993 के विधानसभा चुनाव में नदबई विधानसभा सीट पर पूर्व राजपरिवार के सदस्य विश्वेन्द्र सिंह को जीत मिली थी. 1993 के बाद से अब तक कांग्रेस को जीत नहीं मिली है.

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कितने वोटर, कितनी आबादी

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2018 के चुनाव की बात करें तो नदबई विधानसभा सीट पर तब 11 उम्मीदवारों के बीच मुकाबला था, लेकिन यहां मुकाबला चतुष्कोणीय रहा जिसमें बीजेपी और बसपा के बीच कड़ी टक्कर दिखी. बसपा के जोगिंदर सिंह अवाना ने चुनाव में 50,976 वोट हासिल किए तो दूसरे नंबर पर रही बीजेपी की उम्मीदवार को 46,882 वोट मिले. कांग्रेस तीसरे स्थान (38,136 वोट) पर रही जबकि एक अन्य निर्दलीय प्रत्याशी खेमकरण तौली (29,529) ने भी कड़ी टक्कर दी और चौथे स्थान पर रहे. बसपा के जोगिंदर सिंह अवाना ने 4,094 मतों के अंतर से यह सीट अपने नाम कर लिया. 2018 के चुनाव में कुल वोटर्स की संख्या 2,55,401 थी जिसमें पुरुष वोटर्स की संख्या 1,36,626 थी तो महिला वोटर्स की संख्या 1,18,775 थी. इसमें से 1,79,771 (70.9%) लोगों ने वोट डाले. जबकि NOTA के पक्ष में 1,214 (0.5%) पड़े थे. नदबई विधानसभा क्षेत्र में करीब 2 लाख 66 हजार मतदाता हैं, जिसमें से करीब 1 लाख 25 हजार जाट मतदाता ही हैं. दूसरे नंबर पर एससी वर्ग के वोट आते हैं. यहां पर एससी वर्ग के कुल 60 हजार के करीब मतदाता है. ब्राह्मण समाज के भी 25 हजार मतदाता रहते हैं तो गुर्जर समाज के मतदाता लगभग 20 हजार हैं. वहीं माली-सैनी भी 15 हजार के लगभग मतदाता हैं. नदबई विधानसभा सीट पर अक्सर जाट समाज का ही प्रत्याशी विधायक बना है.

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कैसा रहा राजनीतिक इतिहास

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नदबई विधानसभा सीट के राजनीतिक इतिहास पर गौर करें तो यहां निर्दलीय प्रत्याशियों का दबदबा रहा है. 1990 के बाद के राजनीतिक परिणामों पर नजर डालें तो साल 1990 के चुनाव में जनता दल ने जीत हासिल की थी. 1993 में कांग्रेस से विश्वेन्द्र सिंह विजयी हुए थे. साल 2008 और 2013 में कृष्णेन्द्र कौर दीपा बीजेपी से जीत कर विधानसभा पहुंची थीं. साल 1998 के विधानसभा चुनाव में यशवंत सिंह रामू ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की थी तो 2003 के चुनाव में नदबई सीट पर कृष्णेन्द्र कौर दीपा ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव में जीत दर्ज की थी. इसके बाद अगले 2 चुनाव में बीजेपी के टिकट पर जीत हासिल की थी. 2018 में बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी की जीत हुई थी. पहली बार बसपा ने नदबई सीट पर जीत हासिल की थी. लेकिन बसपा विधायक और गुर्जर समुदाय से आने वाले जोगिंदर सिंह अवाना बाद में कांग्रेस में चले गए.

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सामाजिक-आर्थिक ताना बाना

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बसपा ने इस बार खेमकरण तौली को यहां से अपना प्रत्याशी बनाया है. खेमकरण तौली साल 2018 के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नदबई सीट पर चुनाव लड़ चुके हैं. खेमकरण तौली को पिछले चुनाव में 29 हजार 529 वोट मिले थे. साथ ही वह जिला परिषद में जिला प्रमुख के पद पर भी रह चुके हैं. अब बसपा ने खेमकरण तौली को टिकट देकर अपना प्रत्याशी बनाया है. तौली जाट समाज से आते है. इस बार फिर नदबई विधानसभा पर कांटे की टक्कर मानी जा रही है.साल 2018 के विधानसभा चुनाव में गुर्जर समाज के नेता जोगिन्दर सिंह अवाना की पहली बार जीत हुई थी. जाट बहुत क्षेत्र में गुर्जर नेता अवाना विजयी हुए थे, लेकिन इस बार उनका विधानसभा क्षेत्र में विरोध किया जा रहा है.

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