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कांग्रेस के पास है ये सीट, क्या इस बार जीत दर्ज करेगी भाजपा

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राजस्थान में सभी राजनीतिक पार्टियां जोरों से चुनाव प्रचार कर रही हैं. वैसे तो मेवाड़ बीजेपी का गढ़ रहा है, लेकिन मेवाड़ में वल्लभनगर विधानसभा सीट एक ऐसी सीट है, जिस पर पूरे प्रदेश की नजर बनी रहती है. बीजेपी- कांग्रेस के कई बड़े नेता भी दौरे कर यहां के मतदाताओं को साधने का प्रयास करते हैं. इस सीट पर कई बार कमल खिला है. वहीं कई वर्षो तक कांग्रेस का राज भी रहा है. स्व. गुलाब सिंह शक्तावत कई बार इस सीट से कांग्रेस के विधायक रहे हैं और सरकार में मंत्री भी. इस सीट पर पहले विधायक 1952 में जनसंघ के आरएसदलीप सिंह रहे और वर्तमान में कांग्रेस की प्रीति शक्तावत विधायक हैं. पिछले के वर्षों से बीजेपी लगातार इस सीट पर पिछड़ रही है. इस सीट पर 2013 में विधायक रहे रणधीर सिंह भिंडर ने बीजेपी का दामन छोड़ अपनी खुद की पार्टी बनाई, उस समय भी बीजेपी को कड़ी हार सामना करना पड़ा तो 2018 में चुनाव के प्रत्याशी रहे उदय लाल डांगी ने रालोपा का दामन थामा तो बीजेपी की जमानत जब्त हो गई.

कितने वोटर, कितनी आबादी

वल्लभनगर विधानसभा में 250000 के करीब मतदाता हैं, जिसमें से 70000 के करीब एससी- एसटी हैं. ब्रह्मण 50 हजार, राजपूत 35 हजार,डांगी- पटेल 25 हजार. जाट, गुर्जर और सुथार सहित अन्य 50 हजार मतदाता हैं.

कैसा रहा राजनीतिक इतिहास

वल्लभनगर विधानसभा सीट से 1952 में पहले विधायक जन संघ से आरएसदलीप सिंह रहे. उसके बाद वर्ष 1957 में कांग्रेस से गुलाब सिंह शक्तावत जीते फिर हरिप्रसाद विधायक बनें. वहीं 1967 में कांग्रेस के गुलाब सिंह जीते और 1972 में फिर से गुलाब सिंह ने जीत दर्ज की. 1977 में कमलेंद्र सिंह जीते तो 1980 में फिर से कमलेंद्र सिंह विधायक बनें. 1985 में गुलाब सिंह जीते, तो 1990 में कमलेद्र सिंह बनें. 1993 में गुलाब सिंह, तो 1998 में फिर से गुलाब सिंह यहां से विधायक बनें. 2003 में बीजेपी से रणधीर सिंह भिंडर जीते और 2008 में कांग्रेस से गजेंद्र सिंह शक्तावत जीते. वहीं 2013 में जनता सेना से रणधीर सिंह भिंडर विधायक बनें और 2018 में कांग्रेस से गजेंद्र सिंह शक्तावत चुनाव जीते. शक्तावत के निधन के बाद 2021 उप चुनाव में उनकी पत्नी प्रीति शक्तावत कांग्रेस से विधायक बनीं. वल्लभनगर विधानसभा में बीजेपी कांग्रेस के साथ जनता सेना और रालोपा भी चुनाव में दम खम के साथ उतरती है. वल्लभनगर विधानसभा में बीजेपी से विधायक रहे रणधीर सिंह भिंडर को 2013 के चुनाव में बीजेपी ने टिकट नहीं दिया तो उन्होंने खुद की पार्टी बनाई जनता सेना और 2013 में एक बार चुनाव भी जीते. उसके बाद वर्ष 2018 और 2021 के चुनाव में कड़ी हार का सामना करना पड़ा. वहीं 2018 के चुनाव में बीजेपी से प्रत्याशी रहे उदयलाल डांगी को 2021 के उपचुनाव में बीजेपी ने टिकट नहीं दिया तो डांगी भी बागी हो गए और रालोपा का दामन थाम लिया और जनता सेना और भाजपा को पछाड़ दिया लेकिन खुद भी हार गए.

आर्थिक-सामाजिक ताना बाना

इस क्षेत्र में सबसे बड़ा मुद्दा यहां की प्यास बुझाने से लेकर रोजगार से जुड़ा है. पीने का पानी तो उपलब्ध है, लेकिन उनको बांधों से गांवों तक पहुंचाने का प्लान नहीं बनाया गया है. दोनों क्षेत्रों में औद्योगिक विकास पर काम नहीं हुआ. रोजगार के अभाव में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक व आंधप्रदेश में यहां के युवाओं के लिए पलायन करना मजबूरी है. औद्योगिक विकास और रोजगार यहां की मुख्य मांगें हैं.

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