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बढ़ता गया सचिन का कद, राजस्थान में कैसे बने कांग्रेस के डिमांडिंग लीडर?

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सचिन पायलट राजस्थान के दिग्गज कांग्रेसी नेता रहे राजेश पायलट के बेटे हैं. राज्य और केंद्र में उन्होंने अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया है. 26 साल की उम्र में 2004 में सांसद बने. खानदानी सीट दौसा से चुने गए. फिर सन् 2009 में सांसद बनकर केंद्र सरकार में मंत्री पद संभाला. इसके बाद सचिन पायलट को प्रदेश की राजनीति में भेजा गया. 2013 में गहलोत के नेतृत्व में राजस्थान में पार्टी बुरी तरह हार गई तो केवल 36 साल की उम्र में सचिन पायलट को राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़े गये चुनाव में देशव्यापी कांग्रेस विरोध लहर देखने को मिली थी, ऐसे में 2014 में सचिन पायलट को हार का सामना करना पड़ा. लेकिन सचिन पायलट करीब 7 साल तक राजस्थान में कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे. प्रदेश में कड़ी मेहनत की. 5 साल बाद कांग्रेस पार्टी को दोबारा सत्ता मिली. अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने और डिप्टी सीएम सचिन पायलट.

सचिन ने जब छोड़ा डिप्टी सीएम का पद

करीब दो साल के बाद सचिन पायलट ने अशोक गहलोत पर कई तरह के आरोप लगाकर बगावत कर दी. दोनों के बीच खींचतान लंबे समय तक चली लेकिन दिल्ली आलाकमान के आगे आने के बाद दोनों में सुलह हुई. हालांकि बगावत की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी, उन्होंने अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री पद छोड़ दिया. लेकिन सचिन एक महज विधायक रहकर भी प्रदेश की सियासत में एक ऐसी कद्दावर शख्यियत बने रहे जिन्होंने बीजेपी के कई दिग्गजों को बड़ी चुनौती दी.

सचिन प्रचार में बनें डिमांडिंग लीडर

सचिन पायलट ने अपनी अनुशासन कला का कई बार प्रदर्शन किया और आलाकमान को प्रसन्न बनाए रखा. हर मौके पर आलाकमान की सभी राजनीतिक मुहिम और अभियान में शरीक होते रहे. उन्होंने कई विधानसभा चुनावों मसलन उत्तर प्रदेश, गोवा, पंजाब, उत्तराखंड, कर्नाटक से लेकर हिमाचल के चुनावी रेलियों में पूरी सक्रियता के साथ प्रचार-प्रसार किया. कांग्रेस के लिए सचिन एक डिमांडिंग लीडर कहलाने लगे. आगे चलकर 25 सितंबर को दिल्ली स्थित आलाकमान ने राजस्थान की कमान सचिन को और गहलोत को पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी देने का मन बनाया लेकिन सचिन से अदावत में गहलोत ने अध्यक्ष पद की कुर्सी से ही तौबा नहीं की बल्कि 25 सितंबर को बगावती तेवरों के चलते विधायक दल की बैठक नहीं हो सकी. बस, यहीं से आलाकमान के दिल में सचिन के लिए सहानुभूति और गहलोत के लिए खटास पैदा हो गयी.

राजस्थान के साथ एमपी में भी रैलियां

अब जबकि सीधे राजस्थान में चुनाव का समय आया है तब वक्त ने एक बार फिर करवट बदली. प्रदेश में सचिन का वो रुतबा नजर आने लगा जो कांग्रेस के तमाम दिग्गजों को नहीं मिल सका. सचिन पायलट के सामने राजस्थान विधानसभा का चुनाव है, इसके बावजूद वो अपने प्रदेश की सीमा से बाहर निकलकर मध्यप्रदेश के शहरों की रैलियों में प्रचार करते नजर आए. यानी उनका एक कदम राजस्थान तो दूसरा कदम मध्यप्रदेश में दिखाई दिया. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में राहुल गांधी के ज्यादा चुनाव प्रचार करने के चलते ऐसा अनुमान लगाया जाने लगा कि वो राजस्थान में कम ध्यान दे रहे हैं. क्योंकि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन की जो परिपाटी है, उसके मुताबिक अब वहां बीजेपी के सरकार बनाने की बारी है. इसके बाद अशोक गहलोत ने इसका गलत संदेश जाने का हवाला देकर अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से गुहार लगाई. इसके बाद आनन फानन में पार्टी की गारंटियों के पोस्टर में गहलोत के साथ सचिन के पोस्टर भी नजर आने लगे. फिर गहलोत और सचिन का गारंटी यात्रा रथ निकालने का प्रोग्राम बनने लगा. चौंकाने वाली बात ये है कि एमपी में कमलनाथ और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल को सीएम चेहरा बताया लेकिन राजस्थान में गहलोत के सीएम होने के बावजूद सीएम का चेहरा घोषित किया गया.

गूर्जरों के पोप पायलट!

राजस्थान समेत 5 राज्यों के नतीजे चाहे जैसे भी सामने आयें लेकिन सचिन गांधी परिवार और खरगे के बाद पैन इंडिया प्रचार के लिए कांग्रेस में सबसे ज्यादा डिमांडिंग लीडर में हैं. सिंधिया, जितिन, आरपीएन जैसे युवा पीढ़ी के तमाम नेताओं के पार्टी छोड़ने के बाद पार्टी भी सचिन का कद बढाकर भविष्य के लिए संजो कर रखना चाहती है. उतार-चढ़ाव भरे दौर से निकले सचिन वैसे खुद को हर जाति, बिरादरी और युवाओं का नेता मानते हैं लेकिन गुर्जरों के बीच सोशल मीडिया में और उनकी रैलियों में लोकप्रियता को देखकर सियासत के जानकर सियासी हास्य-व्यंग्य में 46 सालां सचिन पायलट को गूर्जरों का पोप भी बता देते हैं.

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