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बाबा रामदेवजी को क्यों कहते हैं पीरों का पीर? पाक से मुस्लिम भक्त भी आते हैं बाबा के दर्शन करने

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राजस्थान के जैसलमेर जिले में बाबा रामदेव के चमत्कारों से हर कोई वाकिफ है। लोक देवता बाबा रामदेव के प्रति देशभर में अटूट श्रद्धा है। वर्ष भर 50 लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा के दरबार में मत्था टेकने के लिए आते हैं। केवल राजस्थान ही नहीं गुजरात, मप्र, महाराष्ट्र, उप्र में बाबा रामदेव के प्रति जबरदस्त आस्था है। मंदिर में चोरी का सामान मिल जाने से रामदेवरा में उत्सव का माहौल है। बाबा रामदेव का मेला परवान पर है। शुक्रवार को सीएम गहलोत जैसलमेर गए और बाबा रामदेव के दर्शन किए और आशिर्वाद लिया। बाबा को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है। वे हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक भी माने जाते हैं। भक्तों का उनके प्रति समर्पण इतना है कि पाकिस्तान से मुस्लिम भक्त भी उन्हें नमन करने भारत आते हैं। सीएम गहलोत बाबा रामदेव के वंशजों से मुलाकात की। सीएम ने प्रदेश की खुशहाली के लिए मंगल कामना की।

मक्का से पीर आए परीक्षा लेने 

कहा जाता है कि जब रामदेव  जी के चमत्कारों की चर्चा चारों ओर होने लगी तो मक्का (सऊदी अरब) से पांच पीर उनकी परीक्षा लेने आए। वे उनकी परख करना चाहते थे कि रामदेव के बारे में जो कहा जा रहा है, वह सच है या झूठ?। बाबा ने उनका आदर-सत्कार किया। जब भोजन के समय उनके लिए जाजम बिछाई गई तो एक पीर ने कहा, हम अपना कटोरा मक्का में ही भूल आए हैं। उसके बिना हम आपका भोजन ग्रहण नहीं कर सकते। इसके बाद सभी पीरों ने कहा कि वे भी अपने ही कटोरों में भोजन करना पसंद करेंगे। रामदेवजी ने कहा, आतिथ्य हमारी परंपरा है। हम आपको निराश नहीं करेंगे। अपने कटोरों में भोजन ग्रहण करने की आपकी इच्छा पूरी होगी। यह कहकर बाबा ने वे सभी कटोरे रूणीचा में ही प्रकट कर दिए जो पांचों पीर मक्का में इस्तेमाल करते थे। यह देखकर पीरों ने भी बाबा की शक्ति को प्रणाम किया और उन्होंने बाबा को पीरों के पीर की उपाधि दी।

भक्त उन्हें प्यार से रामापीर या राम सा पीर भी कहते हैं

बाबा रामदेव राजस्थान के प्रसिद्ध लोक देवता हैं।  जैसलमेर के रूणीचा में बाबा का विशाल मंदिर है जहां दूर-दूर से श्रद्धालु उन्हें नमन करने आते हैं। रामदेवजी सामुदायिक सद्भाव तथा अमन के प्रतीक हैं। बाबा का अवतरण वि.सं. 1409 को भाद्रपद शुक्ल दूज के दिन तोमर वंशीय राजपूत तथा रूणीचा के शासक अजमलजी के घर हुआ।उनकी माता का नाम मैणादे था। बाबा का संबंध राजवंश से था लेकिन उन्होंने पूरा जीवन शोषित, गरीब और पिछड़े लोगों के बीच बिताया। उन्होंने रूढिय़ों तथा छूआछूत का विरोध किया। कुछ विद्वान मानते हैं कि बाबा का अवतरण वि.सं. 1409 में उडूकासमीर – बाड़मेर में हुआ। उन्होंने रूणीचा में समाधि ली थी, लेकिन बाबा के भक्तों के लिए इतिहास की इन तिथियों से ज्यादा उनकी कृपा महत्वपूर्ण है। आज भी यहां के शुभ कार्य बाबा के पूजन के बिना अधूरे हैं। विक्रमसंवत 1409 में चैत्र सुदी पंचमी को अजमाल तंवर के घर अवतरित बाबा रामदेव ने विक्रम संवत 1442 में भादवा सुदी एकादशी को समाधि ली। 33 वर्ष के अल्प काल में उन्हें कई चमत्कार किए। लोग उन्हें साक्षात कृष्ण का अवतार मानते हैं। बाबा रामदेव ने अपने जीवनकाल के दौरान 24 चमत्कार(परचे) दिए जिन्हें लोग लोकगाथाओं में बाबा रामदेव के भक्तगण आज भी बड़े से गाते हैं

50 लाख से ज्यादा श्रद्धालु आते हैं

बाबा रामदेव के दर्शन करने यूपी, बिहार, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। इस समय बाबा रामदेव का मेला भर रहा है। गहलोत सरकार ने राजस्थान से बाहर आने वाले वाहनों को शुल्क में छूट प्रदान की है। 17 हजार की जगह अब करीब 6 हजार रुपये का ही शुल्क लगेगा। अपने जीवनकाल एवं समाधी के बाद कई अलौकिक कार्य किए जाने से बाबा रामदेव की कीर्ति राजस्थान सहित देश के अन्य प्रांतों में उत्तरोत्तर बढ़ती गई। जिसके फलस्वरूप प्रतिवर्ष बाबा रामदेव की समाधि स्थल रामदेवरा में प्रतिवर्ष भादवा एवं माघ महीने में बड़े मेलों का आयोजन होता है। भादवा महीने में तो एक माह की अल्प अवधि में देश भर से पचास लाख से अधिक श्रद्धालु अपने आराध्य की समाधि स्थल पर श्रद्धा अर्पित करने आते हैं। जिसमें 20 लाख से अधिक यात्री तो पदयात्रा करके रामदेवरा पहुंचते हैं। भादवा माह में मेले के दौरान रामदेवरा कस्बा महानगर का रूप धारण कर लेता है।

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