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38 टांके-10 फीसदी दिव्यांग, फिर भी नहीं टूटा जज्बा, साइकिल से तय किया 30 हजार KM

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बाड़मेर: राजस्थान के सरहदी इलाके के एक छोटे से गांव के युवा ने दुनिया में भारत का नाम रोशन किया है. बाड़मेर जिले के छोटे से गांव लंगेरा के एक युवा के पर्यायवरण संरक्षण को लेकर जुनून ने आज उन्हें विश्व रिकॉर्ड तक पहुंचा दिया. दरअसल ग्रीनमैन नाम से फेमस नरपत सिंह राजपुरोहित ने हाल में देश की सबसे लंबी साइकिल यात्रा निकाल कर विश्व कीर्तिमान बनाया है जिसके बाद उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो गया है. जानकारी के मुताबिक ग्रीनमैन नरपत सिंह ने साइकिल से 30121 किलोमीटर की दूरी की यात्रा पूरी की है. राजपुरोहित, जिन्हें पिछले गुरुवार को उनका प्रमाण पत्र मिला उनका कहना है कि उनकी यात्रा जनवरी 2019 में जम्मू से शुरू हुई जिसे इसे अप्रैल 2022 में जयपुर में पूरा किया गया. बता दें कि राजपुरोहित ने इस दौरान 29 राज्यों को कवर किया. वहीं राजपुरोहित ने कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान तमिलनाडु में लगभग चार महीने के लिए यात्रा को रोक दिया था. वहीं उन्होंने यात्रा के दौरान करीब 93,000 पौधे भी लगाए हैं. वहीं साइकिल यात्रा के दौरान नरपत को कई पहाड़ी इलाकों और तेज बारिश से भी जूझना पड़ा.

‘पहाड़ जैसी चुनौतियों के आगे फौलादी इरादे’

नरपत सिंह बताते हैं कि दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर बात हो रही है जो कि अब बहुत जरूरी है और हमें अब इसे गंभीरता से लेना चाहिए. नरपत के मुताबिक इस तरह की यात्रा में हमेशा एक टीम एक गाड़ी साथ होती है लेकिन मैंने यह सब नहीं लिया. उन्होंने बताया कि तटीय इलाकों में जाने पर उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा और इस दौरान एक हादसे में उनके हाथ में भी चोट लगी थी. नरपत ने बताया कि उनका एक ही लक्ष्य था कि पर्यावरण को बचाने के अपने अभियान को अधिक से अधिक लोगों तक लेकर जाऊं और यात्रा के दौरान उन्होंने करीब 1400-1500 जगहों पर सभाएं कर पर्यावरण को बचाने का संदेश दिया.

पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरुकता का संदेश

बता दें कि नरपत सिंह राजपुरोहित को पर्यावरण संरक्षण और जल संरक्षण जागरूकता संदेश देने के लिए इस यात्रा को पूरा करने में कुल 3 साल 2 महीने 24 दिन का समय लगा जहां उनकी साइकिल 1179 दिनों में 26 राज्यों को 467 ज़िलों से होकर गुजरी.मालूम हो कि ग्रीनमैन नरपत सिंह के एक पैर में 38 टांके और शरीर में 10% विकलांगता है लेकिन वह अपने लक्ष्य से कभी नहीं भटके. वहीं यात्रा के दौरान वह बताते हैं कि उन्हें उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सीमा पर कालेसर अभ्यारण्य में पैंथर का सामना भी करना पड़ा.

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