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राजस्थान की ‘हॉकी वाली सरपंच’, अपनी 2 साल की तनख्वाह से बना डाली विमेंस टीम

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एक समय था जब वह हॉकी की अच्छी खिलाड़ी हुआ करती थी. सपना था, हॉकी में आगे बढ़कर देश का नाम रोशन करूं, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. किन्हीं कारणों से बीच में ही खेल छोड़ना पड़ा. समय बीतता गया और शादी भी हो गई, लेकिन हॉकी के प्रति जज्बा कम नहीं हुआ और आज गांव की बेटियां को हॉकी के गुर सिखा रही हूं. हॉकी की एक टीम तैयार कर दी है. बेटियों को जब हॉकी के ग्राउंड पर खेलते हुए देखती हूं तो मुझे अपने दिन याद आ जाते हैं. हम बात कर रहे हैं झुंझुनूं जिले के लांबी अहीर ग्राम पंचायत की सरपंच नीरू यादव की, जिनकी पहचान आज हॉकी वाली सरपंच से है. सरपंच नीरू यादव की कहानी संघर्ष भरी रही, लेकिन उनके जज्बे और जुनून को आज हर कोई सलाम कर रहा है.

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सरपंच बनीं तो सपने को पूरा करने का मौका मिला

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नीरू यादव का मायका हरियाणा के नारनौल में है. झुंझुनूं के लांबी अहीर के अशोक यादव से 2013 में इनकी शादी हुई थी. अक्टूबर 2020 में नीरू जिले की बुहाना तहसील की पंचायत लांबी अहीर की सरपंच चुनी गईं. सरपंच बनने के बाद नीरू के मन में एक ख्याल आया कि क्यों ने अपने भीतर छिपे हॉकी के प्लेयर को ग्राउंड पर उतारा जाए. उन्होंने बेटियों के माध्यम से खुद के भीतर का हॉकी प्लेयर मैदान उतारने का निर्णय किया. जुनून ऐसा कि अपना दो साल का वेतन भी गर्ल्स हॉकी टीम तैयार करने में खर्च कर दिया और एक साल में ही हॉकी की टीम खड़ी कर दी. इसके लिए नीरू को काफी परेशानी झेलनी पड़ी. घर-घर जाकर बेटियां के परिजनों से बात करनी पड़ी. एक बार तो वह राजी नहीं हुए, लेकिन जब नीरू ने उन्हें सुरक्षा का विश्वास दिलाया तो बेटियों को मैदान में उतारने की हां कर दी. इसके बाद नीरू ने टीम तैयार करने के लिए अपने खर्चे पर कोच की व्यवस्था की. वे बताती हैं कि उन्होंने लड़कियों की ट्रेनिंग और उनको हॉकी के गुर सिखाने के लिए अपना दो साल का वेतन तक लगा दिया. गांव लांबी अहीर में मैदान नहीं होने से प्रैक्टिस करने की समस्या आई तो वे अपने खर्चे पर गाड़ी से लड़कियों को सुबह-शाम 8 से 10 किलोमीटर दूर पचेरी तक लेकर जाती थीं. टीम की खिलाड़ियों के लिए हॉकी किट आदि की व्यवस्था भी की और अब तो गांव में ही हॉकी ग्राउंड भी बनवा दिया है.

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गांव में प्रतिभाएं खूब

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नीरू यादव ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र में प्रतिभाएं खूब हैं, लेकिन मौका नहीं मिल पाता है. बेटिया ग्राउंड पर कम ही दिखाई देती हैं. इसका बड़ा कारण यह है कि बेटियों के पैरेंट्स सुरक्षा को लेकर काफी चिंतित होते हैं. इसलिए लड़कियां मैदान पर कम ही नजर आती हैं. खेलों में लडकियों का रूझान होते हुए भी वह प्रतिभा नहीं दिखा पाती हैं.

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स्टेट और नेशनल टारगेट

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नीरू की यह गर्ल्स हॉकी टीम अभी तक जिला स्तर पर और ग्रामीण ओलंपिक खेलों में अपना कौशल दिखा चुकी है. गर्ल्स हॉकी टीम ग्रामीण ओलंपिक में ब्लॉक स्तर पर विजेता रह चुकी है और अब स्टेट व नेशनल गेम्स इस टीम का टारगेट है.

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