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बिहार में पहले अगड़े, उसके बाद पिछड़े और अब क्या अतिपछड़ों की आएगी बारी?

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बिहार की सियासत नई करवट लेती हुई दिख रही है. जातिगत जनगणना के आंकड़े सोमवार को जारी कर दिए गए हैं. उसके मुताबिक सबसे ज्यादा 63 फीसदी ओबीसी है, जिसमें 27 फीसदी पिछड़ा वर्ग तो 36 फीसदी अतिपिछड़ी जातियां हैं. दलित 19.65 फीसदी, आदिवासी 1.68 फीसदी तो सवर्ण जातियां 15.65 फीसदी हैं. इस लिहाज से बिहार की सियासत में सबसे अहम भूमिका अतिपिछड़ी जातियों की होने वाली है, क्योंकि असल किंगमेकर बिहार की यही जातियां हैं? आजादी के बाद लंबे समय तक बिहार की सियासत पर सवर्ण जातियों का दबदबा था. कायस्थ लेकर ब्राह्मण, राजपूत और भूमिहार समुदाय के हाथों में सत्ता की कमान रही, लेकिन उसके बाद जेपी आंदोलन ने ओबीसी के लिए सियासी दरवाजे खोल दिए. बिहार के पहले ओबीसी मुख्यमंत्री सतीश प्रसाद सिंह बने थे, लेकिन वो तीन दिन ही कुर्सी पर रह सके और उसके बाद बीपी मंडल को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी. वहीं से ओबीसी के लिए मुख्यमंत्री का रास्ता खुला. उनका सियासी प्रभाव मंडल कमीशन के बाद बढ़ा तो फिर अभी तक बोलबाला है. लालू यादव से लेकर राबड़ी देवी और नीतीश कुमार ओबीसी वर्ग से आते हैं. जातिगत जनगणना के जो आंकड़े सामने आए हैं उससे अतिपिछड़ा समुदाय यह कह सकता है कि अगली बारी उनकी है. बिहार में अतिपिछड़े वर्ग की आबादी 36 फीसदी है, जिसमें करीब 114 जातियां शामिल हैं. ऐसे में बिहार में अतिपिछड़ा वर्ग राजनीति में अपनी भागीदारी को लेकर नए सिरे से दावा कर सकता है, क्योंकि उनकी आबादी के लिहाज से यह कहा जा सकता है कि सत्ता की चाबी अब उनके हाथों में है. नीतीश कुमार की जेडीयू से लेकर आरजेडी और बीजेपी तक की नजर अतिपिछड़ी जातियों के वोटबैंक पर है.

114 जातियों पर सभी दलों की नजर

बिहार में अतिपिछड़ी जातियों में केवट, लुहार, कुम्हार, कानू, धीमर, रैकवार, तुरहा, बाथम, मांझी, प्रजापति, बढ़ई, सुनार, कहार, धानुक, नोनिया, राजभर,नाई, चंद्रवंशी, मल्लाह जैसी 114 जातियां अतिपिछड़े वर्ग में आती हैं. इनकी आर्थिक, सामाजिक स्थिति कमज़ोर होने के अलावा भी आबादी का बड़ा हिस्सा होने के बाद भी सियासी प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है. छोटी-छोटी जातियां, जिनकी आबादी कम है, लेकिन चुनाव में फिलर के तौर पर वो काफी अहम हो जाते हैं. जब किसी दूसरे वोटबैंक के साथ जुड़ जाते हैं तो एक बड़ी ताकत बन जाते हैं.

बिहार में अतिपिछड़ी वर्ग के 7% ही विधायक

नीतीश कुमार ने इन्हीं तमाम छोटी-छोटी अतिपिछड़ी जातियों को मिलाकर अपना सियासी आधार खड़ा किया है तो यूपी में बीजेपी ने भी इसी फॉर्मूले पर खुद को दोबारा से खड़ा करने में कामयाब रही है. बीजेपी ने तमाम अतिपिछड़ी जातियों को नेतृत्व देने का काम किया है, जिसे कभी कांशीराम ने यूपी में किया था तो बिहार में कर्पुरी ठाकुर ने करके दिखाया. बिहार की सियासत में स्थापित राजनीतिक पार्टियां अलग-अलग जातियों के नेताओं को अब आगे करके अपनी राजनीति कर सकती हैं. हालांकि, अतिपिछड़ी जातियां 36 फीसदी आबादी होने के बाद भी बिहार विधानसभा में महज 7 फीसदी विधायक हैं, लेकिन जातिगत जनगणना के बाद यह स्थिति बदल सकती है.

अतिपिछड़े वर्ग से बिहार में जेडीयू ने बनाई पकड़

बिहार में अतिपिछड़ी जातियां लोकसभा चुनाव 2024 का गेमचेंजर साबित हो सकती हैं. नीतीश ने 2005-10 के शासनकाल में दो नई जातीय वर्गों को बनाया. इसमें एक था महादलित और दूसरा था अतिपिछड़ा. इस अतिपिछड़े वर्ग को ही जेडीयू ने अपना मुख्य वोटबैंक बनाने में सफल रही. अब बिहार में जातीय जनगणना की जो रिपोर्ट आई है, उसमें ये साफ पता चल रहा है कि अतिपिछड़ी जातियां कितनी अहम हैं. जातीय जनगणना का सबसे अहम पक्ष केवल जातियों की संख्या का अनुमान नहीं है बल्कि हर जाति की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति का अनुमान लगेगा.ऐसी स्थिति में माना जा रहा है कि हर राजनीतिक दल की नजर पिछड़े वर्ग और अति पछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ने पर है, लेकिन उसके साथ ही उनके राजनीतिक उभार का भी है.

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