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2030 तक क्या एड्स हो जाएगा छूमंतर… भारत को करने होंगे ये 3 काम

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लाइलाज शब्द जिस एक बीमारी के साथ शुरुआत से नत्थी हो गया, वह था एड्स. न सिर्फ इस पर बात करने से हम कतराते हैं, बल्कि जिनको यह बीमारी है, उनसे भी हम दूरी बना लेते हैं. एड्स को लेकर लोगों में जागरूकता की बहुत ज्यादा कमी है. जागरूकता फैलाने के मकसद से साल 1988 में 1 दिसंबर को ‘विश्व एड्स दिवस’ मनाने की शुरुआत हुई. सवाल यह है कि 25 सालों में एड्स के खिलाफ हमारी लड़ाई कहां पहुंची, भारत एड्स के खिलाफ जंग में कहां खड़ा है, इसकी रोकथाम और उपचार के लिए क्या कर रहा और क्या उसे करने की ज़रूरत है? आइए समझते हैं कि संयुक्त राष्ट्र (UN) से जुड़ी संस्था जो एड्स पर काम करती है, उसका क्या मानना है.

2030 तक एड्स हो जाएगा खत्म?

यूएन ने एड्स की समस्या, इसके इलाज, संक्रमितों की संख्या को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट पिछले दिनों जारी की थी. रिपोर्ट की एक बात जो अखबारों की हेडलाइन बनी, वह थी यूएन का ये कहना कि साल 2030 के आखिर तक एड्स को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है, लेकिन यह तभी संभव है जब जमीनी स्तर पर इंफेकटेड यानी संक्रमित लोगों के ट्रीटमेंट के लिए काम कर रहे लोगों को जरुरी चीजें मुहैया कराई जाएं. साथ ही एड्स के खात्मे को लेकर जो संस्थाएं काम कर रही हैं, जिन्हें अभी तक मान्यता नहीं मिली, लगातार जिन पर हमले हो रहे हैं और जो फंड की कमी से जूझ रहे हैं, उन तक जरूरी मदद पहुंचाई जाए. AIDS सोसाइटी ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट डॉ. ईश्वर गिलादा, जिन्होंने 1985 में भारत का पहला एड्स जागरूकता अभियान और 1986 में पहला एड्स क्लिनिक शुरू किया था, वह यूएन के 2030 वाले टारगेट को थोड़ा वास्तविकता से परे मानते हैं. लेकिन उनका मानना है कि इस तरह के नामुमकिन लगने वाले लक्ष्य कई बार जरूरी होते हैं, ताकि उसको ध्यान में रख कर लोग काम मिशन मोड में काम कर सकें. हालांकि गिलादा साहब को यूएन से थोड़ी शिकायत है. उनका कहना है कि यूएन जैसी संस्थाएं इतने बड़े-बड़े जो लक्ष्य निर्धारित करती हैं, वह भारत ही के भरोसे कर पाती हैं लेकिन वह भारत के योगदान को अपने फुटनोट में भी जगह नहीं देती. डॉक्टर गिलादा एड्स के खिलाफ जंग में भारत की भूमिका को बेहद सराहनीय बताते हैं. उनके मुताबिक, ”अगर भारत नहीं होता तो ये लड़ाई यहां तक नहीं पहुंच पाती. भारत का योगदान ये है कि जितने दुनिया के एचआईवी पॉजिटीव लोग हैं. उनमें 92 प्रतिशत लोग भारत की दवाईयों का इस्तेमाल करते हैं. भारत ने एड्स के उपचार में इस्तेमाल होने वाली अगर जेनरिक दवाईयां न बनाई होती तो स्थिति बड़ी दयनीय होती क्योंकि भारत के जेनरिक दवाइयों की तुलना में पेंटेंट दवाईयों की कीमत करीब 100 गुना अधिक है. ऐसे में, यूएन जैसी संस्थाओं को भारत की भूमिका को दर्ज करने की जरुरत है.”

एड्स को लेकर कुछ चौंकाने वाले फैक्ट्स

दुनिया भर में करीब 3 करोड़ 90 लाख लोग एचआईवी से ग्रसित हैं. एचआईवी ही वह वायरस है जिस कारण किसी शख्स को एड्स होता है. तकरीबन 4 करोड़ लोग समूची दुनिया में इस खतरनाक बीमारी से जूझ रहे हैं, इनमें 2 करोड़ यानी करीब आधे संक्रमित लोग पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका के रहवासी हैं. वहीं, 65 लाख से अधिक लोग एशिया और पैसिफिक क्षेत्र के रहने वाले हैं. सबसे दुखद बात ये है कि जिन 4 करोड़ लोगों को एड्स की समस्या है, उनमें 92 लाख यानी करीब एक-चौथाई लोगो के पास इसके ट्रीटमेंट के लिए जरूरी चीजें नहीं हैं. पिछले साल, 2022 में एड्स से संबंधित बीमारियों से 6 लाख 30 हजार लोगों की मौत हुई थी जबकि इस दौरान दुनिया भर में 13 लाख लोग HIV से संक्रमित हुए थे. अगर भारत की बात करें तो देश में 24 लाख एचआईवी के मरीज हैं. पिछले साल भारत में 60 हजार मामले दर्ज किए गए जबकि इसी दौरान 42 हजार लोगों की जान भारत में एड्स के कारण हुई. शुरुआत में एड्स के खिलाफ जो भी अभियान भारत में चलाए जा रहे थे, उन सबकी फंडिंग बाहर से होती थी लेकिन पिछले 10-15 सालों में भारत अपने ही बलबूते एड्स के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है.

भारत, एड्स के खिलाफ जंग और 3 कमियां

भारत की इस जंग में लेकिन कुछ कमियां हैं. डॉक्टर गिलादा चाहते हैं फौरी तौर पर ऐसी 3 कमियों को दूर किया जाए:-

पहला – भारत पिछले कुछ बरसों में एचआईवी के ट्रीटमेंट में तो जुट गया लेकिन जो इस दिशा में जागरुकता फैलाने वाले कार्यक्रम थे, उसको हमने बंद ही कर दिया. इस वजह से एचआईवी अवेयरनेस प्रोग्राम से एक पूरी पीढ़ी ही महरुम रह गई.

दूसरा – PrEP यानी प्री एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस का भारत के ऑफिशियल कार्यक्रम में न होना भी मुसीबत बन रहा है. PrEP एक दवा है उन लोगों के लिए, जिन्हें पहले से एचआईवी नहीं है लेकिन उन्हें इसके होने का खतरा है. इसे लेने से एचआईवी के जोखिम को कम किया जा सकता है.

तीसरा – जिस तरह कोविड के दौरान घर-घर कोविड के टेस्ट किट पहुंच गए, उसी तरह एचआईवी होम टेस्टिंग या जिसे एचआईवी सेल्फ टेस्ट कहते हैं, वह लोगों तक नहीं पहुंच पाया. यह भारत के आ़फिशियल प्रोग्राम में भी नहीं है जबकि इसको आए हुए पांच साल से अधिक हो गए, यह ऑनलाइन उपलब्ध है लेकिन चूंकि इसकी पहुंच लोगों तक सरकारी कार्यक्रम के तहत नहीं है, भारत में बहुत से लोग आसानी से एचआईवी से संक्रमित हैं या नहीं, इसका पता नहीं लगा पाते.

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