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राजस्थान: बांसवाड़ा के मानगढ़ धाम से कांग्रेस का चुनावी शंखनाद, 59 सीट और 31 फीसदी वोट साधेंगे राहुल-खरगे

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कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी 9 अगस्त को बांसवाड़ा के मानगढ़ धाम जाएंगे. विश्व आदिवासी दिवस पर राहुल गांधी मेवाड़ के इस इलाके में एक रैली को संबोधित करेंगे, जिसमें भारी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग शामिल होंगे. कांग्रेस पार्टी के इन दो नेताओं के इस दौरे के पीछे वो 59 सीटें हैं, जिसमें से ज्यादातर को जीत कर राजस्थान में पिछली बार कांग्रेस की सरकार बनी थी. राजस्थान विधानसभा में 200 सीट हैं. इनमें से 59 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. 34 सीटें अनुसूचित जाति के लिए और 25 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित हैं. वहीं जनसंख्या के लिहाज से देखें तो सूबे की 17.8 फीसदी आबादी दलित और 13.5 फीसदी आबादी आदिवासी समुदाय की है. यानी कुल जमा राजस्थान में SC-ST समुदाय की आबादी 31 फीसदी से ज्यादा है. यानी लगभग सूबे का एक तिहाई मतदाता इन समुदायों से है.

दोनों दलों के दिग्गजों की क्यों है यहां नजर

राजस्थान की सियासी मजबूरी है कि न ही कांग्रेस और न ही बीजेपी इन समुदायों को छोड़ना चाहेगी. पिछले चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने इनमें से 31 सीटें जीतीं और इनके बूते राज्य की सत्ता हासिल की. अब राजस्थान में फिर एक बार विधानसभा के चुनाव नजदीक आ गए हैं. ऐसे में इन इलाकों में लगातार दोनों ही बड़े दलों के दिग्गज दौरा कर रहे हैं. कांग्रेस पार्टी के दोनों वरिष्ठ नेता इसी कड़ी में बुधवार को बांसवाड़ा पहुंच रहे हैं. एक तरफ जहां खरगे दलित समुदाय से आते हैं तो उनके बूते पार्टी दलित समुदाय को अपने पाले में खींचने की कोशिश कर रही है तो वहीं आदिवासी दिवस पर राहुल गांधी की कोशिश आदिवासी समुदाय को साधने की होगी. बुधवार की रैली में मुख्य ध्यान आदिवासी समुदाय पर दिया जाएगा. यहीं से राजस्थान में कांग्रेस का चुनावी शंखनाद भी होगा.

आखिर बांसवाड़ा ही क्यों चुना?

दक्षिण राजस्थान में बांसवाड़ा-डूंगरपुर सबसे बड़ा इलाका है. मेवाड़ का ये क्षेत्र इन दो जिलों के मिलने के बाद वाकड़ का इलाका कहलाता है. आदिवासी बहुल इस इलाके की सीमाएं गुजरात और मध्य प्रदेश से मिलती हैं. सबसे पहले समझते हैं इस इलाके की डेमोग्राफी को. मेवाड़ में कुल 28 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 17 सीटें अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित हैं. इनमें से ज्यादातर सीटें बांसवाड़ा-डूंगरपुर में और फिर उदयपुर में हैं.

बांसवाड़ा-डूंगरपुर में आरक्षित सीटें

  • डूंगरपुर
  • सांगवाड़ा
  • चोरासी
  • घाटोल
  • गरही
  • बांसवाड़ा
  • बागीडोर
  • कुशलगढ़

उदयपुर में आदिवासी आरक्षित सीटें

  • गोगुंडा
  • झाडोल
  • खेरवाड़ा
  • उदयपुर ग्रामीण
  • सालुंबेर
  • धारियावाड़
  • आसपुर

बांसवाड़ा के पास है सत्ता की चाबी

बांसवाड़ा में पड़ने वाली 8 आदिवासी आरक्षित सीटों पर जिसके पास ज्यादा सीटें होती हैं, उसकी सरकार राजस्थान में बनती है. साल 2008 में कांग्रेस पार्टी ने बांसवाड़ा की 8 में से 6 सीटों पर जीत हासिल की और सूबे में सरकार बनाई. अगली बार यानी साल 2013 में बीजेपी ने 8 में से 7 सीटें जीतीं और सरकार बनाई.पिछले विधानसभा चुनाव में बांसवाड़ा में मुकाबला भारतीय ट्राइबल पार्टी के आने के बाद कड़ा हो गया था.

2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 3 और बीजेपी को 2 सीटें मिलीं. एक-एक सीट निर्दलीय और बीटीपी को मिली. बीटीपी के आने का असर कांग्रेस के वोटों पर पड़ा था. जबकि गुजरात की इस पार्टी ने विधानसभा चुनावों के दो महीने पहले ही राजस्थान में लड़ने का मन बनाया था. अब इसकी तैयारी मजबूत है. ऐसे में कांग्रेस हरगिज भी इस दल को उठने का मौका नहीं देगी, क्योंकि ऐसा होता है तो सीधे असर कांग्रेस के वोट पर पड़ेगा.

बांसवाड़ा से साधेंगे तीन-तीन राज्य

वाकड़ का ये इलाका मध्य प्रदेश और गुजरात के आदिवासी इलाकों से जुड़ा हुआ है तो इसका सीधा असर उन राज्यों में भी दिखाई देता है. मध्य प्रदेश में भी राजस्थान के साथ-साथ विधानसभा चुनाव होना है. मध्य प्रदेश में भी आदिवासी समुदाय के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं. इन सीटों पर पिछले चुनावों में बीजेपी की पकड़ कमजोर हुई है और कांग्रेस की मजबूत. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी मध्य प्रदेश की 47 आदिवासी आरक्षित सीटों में 31 जीतने में कामयाब हुई थी. जिसके बूते पार्टी ने सूबे में सरकार बना भी ली थी. 2013 तक इन सीटों पर बीजेपी की पकड़ थी. 2013 में बीजेपी ने इन 47 में से 37 सीटें जीती थीं. अगले चुनाव में बीजेपी 37 से 16 सीटों पर आ गई. जो सीटें बीजेपी से छिटकी वो कांग्रेस के पास गईं. कांग्रेस अब आदिवासी समुदाय के इस समर्थन को हरगिज भी गंवाना नहीं चाहती. इसलिए वो आदिवासियों के गौरव से जुड़े मानगढ़ के जरिए राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के आदिवासी समुदाय को खुद से जोड़ना चाहती है.

मानगढ़ धाम को ही क्यों चुना?

कांग्रेस ने बांसवाड़ा के जिस मानगढ़ धाम को चुना है उसे आदिवासियों का तीर्थ स्थल कहा जाता है. बताया जाता है कि इसी मानगढ़ की पहाड़ी पर 17 नवंबर 1913 को अंग्रेजों ने 1500 आदिवासियों को मार डाला था. जलियांवाला बाग नरसंहार से बड़े इस कांड और उन 1500 भील आदिवासियों की याद में मानगढ़ की पहाड़ी पर मानगढ़ धाम बनाया गया है, जिसे आदिवासी अपने गौरव की तरह देखते हैं और हर साल यहां लगने वाले मिले में हजारों की संख्या में जुटते हैं.

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